यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

मेरी कथायात्रा

 (विविध) 
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रचनाकार:

 कृष्णा सोबती

अपनी साहित्यिक यात्रा में मुझे न किसी को पछाड़ने की फ़िक्र रही और न किसी से पिछड़ने का आतंक। इरादा सिर्फ इतना कि लिखते रहो, अपने कदमों से बढ़ते रहो, अपनी राह पर। जो देखा है, जाना है, जिया है, पाया है, खोया है, उसके पार निगाह रखो। एक व्यक्ति के निज के आगे और अलग भी एक और बड़ी दुनिया है। उसे मात्र जानने की नहीं, अपने पर उतारने की समझ जगाओ। तालीम बढ़ाओ। फिर जो उजागर हो, उसे समेट लो! याद रहे यह कि जो तुम हो, उसे ही संवेदन का मानदंड समझ लेना काफी नहीं। जो तुमने झेला है, संघर्ष उतना ही नहीं। अपनी सीमाओं और क्षमताओं पर आँख रखते हुए- सफल और विफल के झमेलों को भूल, अथक परिश्रम और चौकसी ही कृतित्व को कृतार्थ करती है। अपने पांव तले की एक छोटी सी ज़मीन पर खड़े होकर, एक बड़ी दुनिया से साक्षात्कार करती है। लेखक में प्रतिभा कितनी है- इसे जांचने-मापने का काम आलोचक के जिम्मे है।

पाठक की उपस्थिति मेरी लिखत को, मेरे पाठ को निगाह देती है, मेरे शब्दों को अर्थ। पंक्तियों के पीछे से सिर उठाती खामोशियां पाठकों द्वारा ही समझी-बूझी और पहचान ली जाती हैं। कृति की तौफीक पाठक की आँख से जुड़ी है। मेज पर लिखे जाने वाले पाठ की प्रतीति और लेखक द्वारा की जाने वाली व्यक्तिगत दखलंदाज़ी के लिए पूरी सावधानी और अगर परिणाम ठीक-सा हो तो मैं उसे रचना का ही पुरस्कार समझती हूं। रचना महज अपने वजूद में लेखक द्वारा लिखी जाने भर से ही उसके अनुशासन को नहीं गरदानती। साहित्य के अपार संचित भंडार के बाहर खड़ा एक अदना सा लेखक सृजनात्मक ऊष्मा और ऊर्जा को कैसे निहारता है, संवारता है, अपने प्राचीनों को कैसे स्वीकारता है, अपनी अगली पीढ़ी को कैसे पड़तालता है, यह सब भी उसकी टटोल और अभिव्यक्ति से जुड़ा है। उसका गहरा अंग है। लेखक होना सहज लगता है पर वह उतना आसान नहीं। लेखक अपनी निज की दुनिया के बरक्स एक बड़ी दुनिया को अपने में समेटे रहता है। अपनी अंतरंग सीमाओं और क्षमताओं को एक बड़ी दुनिया के पक्ष में खड़ा करता है। यही प्रक्रिया उसे व्यक्ति के सीमित अस्तित्व से उबार कर समाज, समय और देशकाल. से . जोड़ती है। मानवीय मूल्यों से जोड़ती है।

भाषा की संयमित चुनौती एक साथ स्पष्ट और घुलनशील होकर विचार की सघनता को मुखड़ा देती है। उसे बरकरार रखती है। विचार, भाव, संवेदन, जो कुछ भी रचना में घट रहा है, वह किसी स्वप्न-बिंब की तरह चेतन और चित्त-शक्ति में आंखों के आगे दृष्टि और दृष्टा दोनों को प्रस्तुत करता चला जाता है। यदि लेखक के पास सीमित अल्प दृष्टि है, अनुभव की कमी है तो कमजोरी को जानकारियों से उपजी दक्षता भी नहीं ढांप सकती। पाठ की रचनात्मक प्रस्तुति मात्र शब्दों के शब्दकोशी हवालों से नहीं, कथ्य के गहन संस्कार और सहज साधारण की टकराहट और मुठभेड़ से ही उपजती-उभरती है। लेखक को अपनी इस द्वंद्वात्मक कशमकश को संचित कर अपने को गौण समझना होता है। इसके बावजूद किसी एक क्षण में कुछ महत्वपूर्ण भी घटित होता है, जब लेखक लेखक नहीं रहता और रचना मात्र रचना नहीं रहती।

यह कटावदार मोड़ नितांत दुर्लभ होता है और खतरों से भरा हुआ। जरा चूके तो गये। स्वयं जिया हुआ, अनुभव किया हुआ, पहले हाथ का कच्चा या पक्का माल ही लेखक की सहज सघनता और संपन्नता का स्रोत नहीं। बहुत कुछ ऐसा भी है, जो लेखक की आंतरिक क्यारी से हरियाता है। उसका बीज और पौध वहीं सुरक्षित है।

-कृष्णा सोबती

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