वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

जूता

 (कथा-कहानी) 
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रचनाकार:

 सआदत हसन मंटो | Saadat Hasan Manto

हजूम ने रुख़ बदला और सर गंगाराम के बुत पर पिल पड़ा। लाठियां बरसाई गईं। ईंटें और पत्थर फेंके गए। एक ने मुंह पर तारकोल मल दिया। दूसरे ने बहुत-से पुराने जूते जमा किए और उनका हार बनाकर बुत के गले में डालने के लिए आगे बढ़ा, मगर पुलिस आ गई और गोलियां चलना शुरू हुईं। जूतों का हार पहनाने वाला ज़ख़्मी हो गया। चुनांचे मरहम-पट्टी के लिए उसे सर गंगाराम अस्पताल भेज दिया गया।

- मंटो

 

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