वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

काश! मैं भगवान होता

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

काश! मैं भगवान होता
तब न पैसे के लिए यों
हाथ फैलाता भिखारी
तब न लेकर कोर मुख से
श्वान के खाता भिखारी
तब न यों परिवीत चिथड़ों में
शिशिर से कंपकंपाता
तब न मानव दीनता औ'
याचना पर थूक जाता
तब न धन के गर्व में यों
सूझती मस्ती किसी को
तब ना अस्मत निर्धनों की
सूझती सस्ती किसी को
तब न अस्मत निर्धनों की
सूझती सस्ती किसी को
तब न भाई भाइयों पर
इस तरह खंजर उठाता
तब न भाई भगनियों का
खींचता परिधान होता
काश! मैं भगवान होता।

तब किसानों पर किसी का
यों न अत्याचार होता
तब मचा हर पल जगत में
यों न हाहाकार होता
तब न ले हल-बैल तपती
धूप में वह दीन चलता
तब न कवि के लोचनों से
अश्रु का झरना निकलता
तब न यों मज़दूर पैसे
के लिए मजबूर दिखता
तब न रोटी की फिकर में
इस तरह मज़दूर बिकता
तब न यों श्रम-स्वेद कण से
लिप्त मानव काम करता
तब न हंटर मार देना
इस तरह आसान होता |
काश! मैं भगवान होता

तब न यों बन दीन मानव
मार खाता क्रुद्ध रवि की
तब न यों धनवान मानव
आह पाता क्षुब्ध कवि की ।'

- दुष्यंत कुमार

 

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