यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

आज जो ऊँचाई पर है...

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 कुँअर बेचैन

आज जो ऊँचाई पर है क्या पता कल गिर पड़े
इतना कह के ऊँची शाख़ों से कई फल गिर पड़े

साँस की पायल पहन कर ज़िंदगी निकली तो है
क्या पता कब टूट कर ये उस की पायल गिर परे

ये भी हो सकता है पत्थर फेंकने वालों के साथ
उन का पत्थर ख़ुद उन्हें ही कर के घायल गिर पड़े

सर पे इतना बोझ और पाँव में इतनी ठोकरें
अच्छा-ख़ासा आदमी भी हो के पागल गिर पड़े

चार पल को हम भी इस दुनिया की आँखों में 'कुँवर'
बन के आँसू आए थे और बन के बादल गिर पड़े

- कुंवर बेचैन

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश