वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

कछुआ

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 स्वरांगी साने

बचपन में कछुए को देखती
तो सोचती थी
क्या देखता होगा
इस तरह हाथ-पैर बाहर निकाल कर
खुले आकाश को
या उस दौड़ को
जिसमें जीता था
कभी उसका पुरखा।

समय के साथ जानने लगी
खतरा न हो तो ही
निकलता है कछुआ
खोल से बाहर।
फिर वो भी हो गई कछुआ
पड़ी रही एक कोने में
कि किसी की निगाह न जाए उस पर
आने-जाने वाले
उसे भी मान लें एक पत्थर।

एक दिन
जाने क्यों
उसे लगा
वो पूरी तरह सुरक्षित है
निकली वो बाहर
बहुत दिनों बाद देखा आसमान
जी भर के ली साँस।

तभी उसे सुनाई देने लगी
खतरों की आहटें
पर
जीने की लालसा में
वो भूल गयी
मरने का भय।

उसे हुआ था पहली बार अहसास
कछुआ नहीं
लड़की है वो
और तभी वो समझ गई यह भी
कि सुरक्षित नहीं है वो
फिर सिमट गई अपने खोल में।

- स्वरांगी साने
  ई-मेल: swaraangisane@gmail.com

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश