राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

मैं सम्पादक (कथा-कहानी)

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Author: रामशरण शर्मा

मैं--सम्पादक!

जी हाँ, मैं भी 'भूतपूर्व सम्पादक! हूँ ! यह तो ठीक है कि मेरे अख़बार का एक ही अंक निकला था....। लीजिए, तमाम बात बतलाए ही देता हूँ

मेरे एक दोस्त थे; नाम--समझ लीजिए 'शूशू बाबू'। आप समझ गए होंगे, कि नाम असली नहीं है।

हाँ, तो एक दिन में क़लम-काग़ज़ लिए झक मार रहा था, कि आ पहुँचे। मैंने देखते ही काग़ज़ खिसका दिया ।

शूशू बाबू में एक विशेषता थी। वह सदा नई से नई स्कीम बना कर लाते थे रुपया कमाने की; बिल्कुल पक्की स्कीम! सो उस दिन भी वह आकर दन से मेज़ पर बैठ गए।

मैंने कहा--“भई, मेज़...।”

"ऊँह”-- उन्होंने कई बार मेज़ को चरचरा कर कहा-- जाने भी दो। अगर तुम मेरी बात मानो, तो हज़ार रुपए की मेज़ पर बैठ सकते हो!

“मेज़ पर बैठ सकता हूँ !”

“यानी मेज़ तुम्हारे आगे आ सकती है!” मैं सब बात चुपचाप सुनता गया लाचारी थी। स्कीम थी एक अख़बार निकालने की!

शूशू ने कहा--“यह क्या दुनिया-भर के लिए तुम लिखा करते हो! मज़ा तो तब है, जब लोग तुम्हारे लिए लिखें!”

मुझे ध्यान आया उन छोटी-छोटी छुपी स्लिपों का, जिन्हें बिलकुल बेतकल्लुफ़ी से सम्पादक लोग मेरे लेखों के साथ लगा कर वापिस भेज देते थे। किसी में वह अपनी असमर्थता पर
अफ़सोस ज़ाहिर करते थे, ओर किसी में जगह की कमी का रोना रोते थे। समझ में नहीं आता कि ऐसे नालायक़ लोग-- जिन्हें इस प्रकार की चिट्ठियाँ छाप कर रखनी पड़ें--क्यों
सम्पादक बन जाते हैं, और बन जाने पर फिर अचल क्यों बने रहते हैं !

खैर, मेरे दोस्त, शूशू, की खींची हुई तस्वीर बड़ी मनमोहक थी। बढ़िया-सा ऑफ़िस, घण्टी, अर्दली, सब कुछ। लेखों, कहानियों का ढेर...और मैं; जी हाँ मैं ही, उनमें से, जिसे जी चाहे...ओह!

हृदय बैठ-सा गया।

“पर शूशू,--मैंने कहा--“भइया, बड़ा रुपया लगेगा। और जो अख़बार न चला तो ?”

“न चलने का क्या अर्थ ?”--उसने फ़र्माया, “भागेगा सरपट ! भई, मकान, फ़र्नीचर, नौकर सब को तो महीने के बाद ही रुपया देना पड़ता है। रहा थोड़ा-सा खर्च रोज़ाना का, सो वह एजेण्टों की पेशगी से चल जाएगा।”

सच मानिए, मेरे शरीर में स्फूर्ति पैदा हो गई। खून में गर्मी की मात्रा बढ़ गई!

“न चलने के क्या मानी, आप ही बताइए!”

आखिर एक साप्ताहिक निकालने की ठहरी। मैं बड़ी गम्भीरता पूर्वक ऑफ़िस में जा कर बैठा। अर्दली का सलाम लिया, ज़रा सिर झुका कर।

उस दिन, एक युगान्तरकारी पत्र का जन्म हुआ। और मैं...मैं...कमरे के बाहर छोटी-सी तख्ती पर लिखा जो था-- 'सम्पादक' वही था मैं!! दो-एक दिन बाद ही म॒झे एक आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा। काम था बड़ा आवश्यक, इसलिए जाना ही पड़ा, और लौटने में भी काफ़ी देर होने की सम्भावना थी। मुझे तो घबराहट थी, पर शूशू ने छाती ठोक कर कहा--“ओह ! तुम जाओ, मैं सब कर लूँगा। बिलकुल!”

मैं ज़रा हिचकिचाया--'पर, सम्पादकीय...?”

“वह तुम लिख कर रख जाओ, अगर चाहो तो।”

बात ज़रा ओछी-सी थी, पर मैंने सम्पादकीय लिख ही डाला। बिलकुल, लाजवाब! बेजोड़!!

धीरे-धीरे खिसकती हुई पहिली तारीख़ आई। मैंने शहर के छहों एजेण्ट ढूँढ डाले, पर मेरा अख़बार न मिला! आखिर स्टेशन पर व्हीलर के यहाँ देखा उसे--ऊपर कवर पर, देखा, एक सिनेमा के एक्टर महोदय आँख मिचका कर जीभ निकाल रहे थे। कैसा बेहूदापन था! यह शूशू भी.... ..!! और तस्वीर के नीचे छपा था--सम्पादक, . . और 'सम्पादक'
के नीचे मेरा नाम !!

मैंने जल्दी से इधर-उधर देखा। कम्बख्त ने सम्पादक का नाम किस बेमोक़े छापा! मालूम होता था, मानो ऊपर की बेहूदा तस्वीर सम्पादक महोदय की ही हो!

मैं लौट आया।

सूट, टाई से लैस मैं पहुँचा अपने दफ़्तर, लेकिन वहाँ बिलकुल सन्नाटा था! अंदर घुस कर देखा, अख़बारों का अम्बार लगा था। बिलकुल ठीक। इतनी माँग थी हमारे
अखबार की ! तब तो......

अन्दर बढ़ कर देखा, शूशू चीड़ के बक्स पर बैठा था, परेशान-सा। सच ही तो, बेचारे को बड़ा काम करना पड़ा होगा।

“शूशू!” मैंने कहा।

“ओह! तुम !!”

कुछ अधिक प्रसन्नता न दिखाई थी उसने। खैर!

“यह सब,” मैंने ढेर की तरफ़ इशारा करके कहा,--“ शायद नया अंक है।”

शूशू ने एक उसाँस ले कर कहा-- पहिला ही है।”

मैं हैरान था। इतने में बाहर धमाके की आवाज़ सुनाई दी। एक लड़का एक पार्सल लिए अन्दर आया, और धड़ाम से उसे डाल कर चल दिया।

मेरी हैरानी देख कर शूशू ने कहा-- देख क्या रहे हो, एजण्टों के यहाँ से वापिस आ रही हैं प्रतियाँ !”

“कितनी कॉपियाँ बिकीं ? मैंने पूछा।

“ग्यारह।”

मैं चुप। कहता भी क्या ?

“सुनते हो, भई”--शूशू ने सहसा कहा, “तुम्हारा देहात वाला मकान कहाँ है!”

“क्यों?"

“वहाँ चलना पड़ेगा एक दम... ! कागज़ वाले का, प्रेस का, मकान का. . देना है न...।”

कुछ देर चुप रह कर उसने फिर कहा--“बड़ा बेवकूफ़ देश है, भइया! मैंने कैसे कैसे लेख, कैसी-कैसी कविताएँ. . .।”

बात काट कर मैंने पूछा--“लेख कहाँ से मँगाए थे? किन-किन के?

शूशू ने मुस्कुरा कर कहा--'उसमें तो मैंने कमाल ही कर दिया था। एक बार ही साल-भर के लेख इकट्ठे कर लिए थे, और बिलकुल मुफ़्त में! बस एक दिन शहर के तमाम अखबारों के दफ़्तरों की रद्दी की टोकरियाँ खरीद ली थीं।”

सच जानिए, जी में आया कि कम्बख्त के एक हाथ दूँ कस के। पर चुपचाप हाथ पकड़ कर कहा--“चलो !”

और वह फिर भी यही कहता है कि इस मुल्क के आदमी ही बेवकूफ़ हैं !

ऐसी सम्पादकी की थी मैंने !!

-रामशरण शर्मा

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