वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

खिचड़ी-खाचिड़ी (बाल-साहित्य )

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Author: भारत-दर्शन संकलन

एक बार शेख चिल्ली को उसके एक दोस्त ने दावत पर बुलाया।

शेख चिल्ली बन-ठन कर अपने दोस्त के घर जा पहुँचे। पहले रेल, बस या कारें तो थी नहीं। लोग बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी पर ही सफर किया करते थे। जिनके पास यातायात के ये साधन भी नहीं थे, वे पैदल ही एक जगह से दूसरी जगह जाते थे। शेख चिल्ली के पास न घोड़ागाड़ी थी और न बैलगाड़ी। दोस्त का घर दूर था, सो पैदल ही चल दिये।

रास्ते में पता नहीं कैसे शेख चिल्ली का पेट खराब हो गया। उन्हें दस्त लग गये। दोस्त के घर पहुँचते-पहुँचते शेख चिल्ली की हालत बहुत खराब हो गई।

दोस्त ने जब शेख चिल्ली का इतना बुरा हाल देखा, तो वह तुरन्त उसे वैद्य के पास ले गया। वैद्य ने दवा दे दी और खाने में खिचड़ी खिलाने को कहा।

शेख चिल्ली का दोस्त उन्हें बहुत चाहता था। उसने तुरन्त शेख चिल्ली के लिए मूंग की दाल की खिचड़ी बनवाई।

शेख चिल्ली को दवा खाने से आराम मिल गया था। उसने पेट भरकर खिचड़ी खा ली।

शेख चिल्ली को खिचड़ी बहुत अच्छी लगी। वह सोचने लगा- "बेगम से कहूँगा, वह भी मुझे ऐसा ही खाना बनाकर खिलाया करें... मगर... इसे कहते क्या हैं? यह तो मुझे पता ही नहीं, फिर बेगम को क्या पकाने के लिए कहूँगा। चलो इसका नाम दोस्त से पूछ लेते हैं।"

"अमां मियां! इसे क्या कहते हैं?"

"शेख साहब! इसे खिचड़ी कहते हैं।" दोस्त ने बताया।

शेख चिल्ली ने उस दिन वहीं आराम किया और अगले दिन दोस्त से विदा लेकर अपने घर को चल दिये।

सारे रास्ते वह 'खिचड़ी खिचड़ी' रटते रहे। शेख चिल्ली की याद्दाश्त जरा कमजोर थी। किसी चीज का नाम तो वह अक्सर भूल जाया करते थे। इसीलिए वह सारे रास्ते खिचड़ी का नाम रटते रहे। अचानक रास्ते में शेख चिल्ली को ठोकर लगी। पांव के साथ-साथ जबान को भी ठोकर लग गई। अब वह खिचड़ी की जगह 'खाचिड़ी' का राग अलापने लगे।

अपनी धुन में मस्त शेख चिल्ली 'खाचिड़ी खाचिड़ी' कहते जा रहे थे।

रास्ते में गेहूँ का खेत पड़ा। वहां खेत का रखवाला चिड़िया उड़ा रहा था। चिड़िया उड़ाते वह थक गया, मगर वह फिर भी अपने काम में लगा था। उसे खेत में चिड़िया उड़ाने की ही तनख्वाह मिलती थी। धूप में तपते खेत के रखवाले ने जब शेख चिल्ली को 'खाचिड़ी-खाचिड़ी' कहते हुए देखा, तो मारे गुस्से के वह दांत किटकिटाने लगा।

बस फिर क्या था! उसने अपना डण्डा उठाया और शेख चिल्ली के पास जा पहुँचा । बेचारा शेख चिल्ली! उसे क्या मालूम था, उसकी खिचड़ी खाचिड़ी बनकर खेत के रखवाले को गुस्सा दिला देगी और वह डण्डा लेकर उसे पीटने आ पहुँचेगा। शेख चिल्ली को पता तब चला, जब उसकी कमर पर दनादन डण्डा बरसने लगा।

शेख चिल्ली चीखता रहा- "हाय, मर गया। कोई बचाओ! अल्लाह के वास्ते मुझ पर तरस खाओ।"

मगर उसने डण्डा नहीं रोका। आखिरकार शेख चिल्ली ने उसके पैर पकड़ लिये। तब जाकर खेत के रखवाले ने उसे छोड़ा और कहा- "अब अगर तूने 'खा चिड़ी' कहा, तो जान से मार डालूंगा।"

"अजी, मेरी तौबा, मेरे बाप की तौबा। सारे खानदान की तौबा... मैं खाचिड़ी नहीं कहूँगा।" शेख चिल्ली ने कान पकड़कर कहा।

"अब जाते-जाते बोलना 'उड़चिड़ि-उड़चिड़ि' समझा?"

"समझ गया।"

शेख चिल्ली अपनी दुखते बदन को सहलाते और आहें भरते आगे चल दिये। अब उनकी जबान से 'उड़चिड़ि-उड़चिड़ि' निकल रहा था और मन ही मन वह सोच रहे थे--"पता नहीं नामुराद को खाचिड़ि से क्या चिढ़ थी, जो अच्छी-खासी खाचिड़ि को उड़चिड़ि बना दिया। हाय! और मेरा उड़नखटोला...।"

शेख चिल्ली उड़चिड़ि का राग अलापते चल दिये। थोड़ी ही दूर पर एक शिकारी चिड़ियों को पकड़ने के लिए जाल बिछाये बैठा था। चिड़ियों का एक बड़ा-सा समूह जाल के नीचे बिछे दानों पर लपकता हुआ आ रहा था।

तभी, शेख चिल्ली 'उड़चिड़ि-उड़चिड़ि' कहता हुआ वहां से निकला।

शेख चिल्ली के शोर से सारी चिड़िया जाल पर बैठने से पहले ही उड़ गईं। यह देख शिकारी आग-बबूला हो उठा।

उसने अपना डण्डा उठाया और लगा पीटने शेख चिल्ली को।

"पता नहीं कमबख्त कहां से आकर मर गया। सत्यानाशी ने मेरी सारी चिड़िया उड़ा दीं कह रहा था, उड़चिड़ी-उड़चिड़ी। तुझे मैं बताऊंगा चिड़िया कैसे उड़ाई जाती हैं।"

बेचारा, किस्मत का मारा शेख चिल्ली, खिचड़ी उसकी जान की ग्राहक बन गई थी।

शेख चिल्ली ने शिकारी के पैर पकड़ लिए- "गलती हो गई बड़े भाई ! खुदा कसम अब कुछ नहीं कहूँगा।"

"कहेगा कैसे नहीं? बोल, आ चिड़ी -आ चिड़ी।"

मरता क्या ना करता? शेख चिल्ली चसकती कमर को पकड़े दोस्त की 'खाचिड़ि' को कोसते, 'आचिड़ी-आचिड़ी' कहते हुए चल दिये।

अभी थोड़ी दूर ही चल पाये होंगे शेख चिल्ली। राह में एक घोड़ागाड़ी पर चार औरतें एक मर्द के साथ जा रही थी। वे चारों उस आदमी की बीवियां थीं। शेख चिल्ली को 'आचिड़ी-आचिड़ी' कहते सुनकर उसने समझा, वह उसकी बीवियों को देखकार 'आचिड़ी-आचिड़ी' कह रहा है।

"ठहर जा बदमाश!" घोड़ा गाड़ी रुकवाकर गुस्से में भुनभुनाता वह आदमी अपनी छड़ी लेकर, शेख चिल्ली पर आ बरसा...!" शेख चिल्ली चीखने लगा।

"हाय... मर गया... हाय जी भरकर पीट लेने के बाद वह बोला-"आज के बाद अगर किसी औरत को देख छेड़ने की कोशिश की, तो वो हाल करूंगा, जो किसी दुश्मन ने भी नहीं सोचा होगा।"

रोता, कलपता शेख चिल्ली रास्ते में पड़ा सोच रहा था--"मरदूद दोस्त ने ऐसा नाम बताया कि...।"

सोचते-सोचते चौंक पड़ा शेख चिल्ली और उछलकर बैठ गया। "अरे हां, याद आ गया वह ना तो आचिड़ी थी, ना उड़चिड़ी और न ही खाचिड़ी--वह तो खिचड़ी थी, खिचड़ी।"

कहते हुए शेख चिल्ली ने डरते हुए आस-पास देखा कि कहीं खिचड़ी का नाम सुनकर कोई उसे मारने तो नहीं आ पहुंचेगा।

[ शेख चिल्ली के कारनामें ]

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