यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।

पूंछ (विविध)

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Author: लतीफ घोंघी

पूंछ और पोंगली की चर्चा आदिकाल से होती रही है। दोनों के बीच भले ही मधुर सम्बन्धों का उल्लेख न मिलता हो, लेकिन व्यवस्था में पूंछ सीधी करने का शाश्वत प्रश्न हमेशा खड़ा होता है और पोंगली जैसी पावरफुल वस्तु का उपयोग वीरगाथा काल से आपातकाल तक होता रहा है। यही कारण है कि आदिकाल से इस युग तक पोंगली का अस्तित्व बना हुआ है। कहीं-कहीं ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि पूंछ सीधी करने की कोशिश में कोई-कोई पोंगली टेढ़ी भी हो जाती है, लेकिन ऐसे उल्लेख बहुत कम मिले हैं। हां, यह उल्लेख जरूर मिलता है कि पूंछ जब तक पोंगली में रहती है, तभी तक सीधी रहती है और पोंगली से बाहर आते ही वह फिर टेढ़ी हो जाती है। यदि यह आदत भी पूंछ में न रहे तो उसे पूंछ कहना ही बेकार है। पूंछ दी ही इसलिए जाती है कि वह टेढ़ी रहे।

यह उस जंगल की कथा है जो चालीस साल पहले आजाद हुआ था, जैसा कि हर जंगल में होता है, इस जंगल में भी एक राजा था। यह जंगल लगभग प्रजातांत्रिक टाइप का जंगल था और इस जंगल के जानवर पूंछ वाले ही थे। हर पांच साल के बाद राजा का चुनाव भी होता था। हर जानवर पूंछ हिलाता हुआ पोलिंग बूथ में जाता, ओर अपने लिए राजा चुनता था। जब लगभग यह तय हो गया कि टेढ़ी पूंछ ही इस जंगल का राजा चुनती है, तो कई जानवरों ने प्लास्टिक सर्जरी से अपनी पूंछें टेढ़ी करवा लीं। आजादी के बाद जंगल में सर्जन भी बढ़ गये थे। फिर हुआ यह कि पूंछ भी दो तरह की होने लगी। एक तो बिलकुल टेढ़ी स्प्रिंग की तरह। तान के सीधी करो और जैसे ही हाथ छोड़ा, फटाक से फिर टेढ़ी। कुछ भविष्यताओं ने और ज्योतिष शास्त्र की नॉलेज रखने वालों ने यह सिद्ध कर दिया कि इस तरह की पूंछ केवल नेतृत्व करने वालों में ही पायी जाती है। इसके बाद जो दूसरी तरह की पूंछ होती थी वह सामान्य पूंछ कहलाती थी। इसका एक विशेष गुण हिलने का होता था। जब देखो तब हिल रही है। जिसके सामने बिठा दो उसके सामने ही हिलने लगे। यह भी पता नहीं चल पाता था कि वे जी रहे हैं या केवल पूंछ ही हिला रहे हैं। लेकिन विद्वानों का कहना है कि सबके दिन फिरते हैं। ऐसी पूंछ वालों के दिन भी फिरे और पूंछ लहर ऐसी चली कि वे पूंछ हिलाते हिलाते राजा ही बन गये। उधर राजा बने और पूंछ हिलाना आपसे आप बन्द हो गया। जिनकी इसके बाद भी हिलती रही, वे तो अनाप-शनाप खर्च करवाकर अपनी पूंछ की स्थिति ठीक करने में ही लगे रहे। कइयों ने तो अपनी पूंछ उखड़वाकर दूसरी पूंछ ही फिट करवा ली थी। लेकिन विद्वानों का आगे चलकर ऐसा भी कहना हुआ कि चार दिन की चांदनी और फिर अंधेरी रात। कुछ विद्वान यह भी कह गये कि होनी को कोई नहीं टाल सकता। जब विद्वान नहीं टाल सके तो फिर पूंछ वालों की क्या हिम्मत हो सकती थी कि वे होनी को रोककर रखें और कहें-- होनी जी, क्या आप इस पूंछ की खातिर टल नहीं सकतीं ?

यानी कि फिर जंगल में अंधेरी रात हो गई। चार दिन की चांदनी में, जिसने पूंछ की हैसियत बना ली सो बना ली। जिसने टेढ़ी करवा ली सो करवा ली। जिनमें देश सेवा की भावना प्रबल थी, उन्होंने अपने ही देश में करवाई और जिनमें कम थी, वे विदेश चले गये।

अब खुल्लमखुल्ला नेतृत्व का प्रश्न सामने था। स्प्रिंगवालों ने अपने साथ सौ-पचास लोगों को भिड़ाया और नेतृत्व करने लगे। एक स्प्रिंग छाप पूंछ और उसके पीछे सौ-पचास हिलने वाली पूंछें। ये सौ-पचास पूंछें इतनी जोर से हिलतीं कि पूरे जंगल की व्यवस्था हिल जाएगी। अब राजा के सामने फिर यह समस्या आ गई कि इन पूंछवालों को ठीक कैसे करें। राजा ने ज्योतिषियों को बुलाया और निदान पूछा। ज्योतिषियों ने राजा से कहा-- महाराज, इसका एक ही इलाज है। आप पोंगलियां बनवा लीजिए और जो पूंछ आपको ज्यादा टेढ़ी लगे उसे पोंगली में डाल दीजिए। यदि यह व्यवस्था ठीक रही तो आप निश्चिन्त होकर जंगल में राज कर सकेंगे।

राजा का काम हर बात में शंका जाहिर करना भी होता है, सो राजा ने यह शंका प्रकट की कि यदि पोंगली के अन्दर भी यह पूंछ ठीक नहीं रही तो क्या होगा?

ज्योतिषियों ने शंका समाधान करते हुए कहा-- राजन, ये व्यवस्था की पोंगली है। मामूली बांस की पोंगली और आपकी इस पोंगली में बहुत फर्क है। यह तो प्रकृति का नियम है कि व्यवस्था की पोंगली में ही पूंछ सीधी रहती है, और जब पूंछ सीधी रहती है, तो यह माना जाता है कि राजा कुशल प्रशासक है। नीतिशास्त्र भी यह कहता है कि जब पूंछ ज्यादा टेढ़ी हो जाए, तो उसे कुछ दिनों के लिए पोंगली में रखना ही विवेकशील राजा का धर्म है, लेकिन चतुर राजा पोंगली के साथ कुछ सुविधाओं की भी घोषणा करता है ताकि पूंछ को भी अपना स्वाभिमान बनाये रखने में परेशानी न हो। जैसा कि शेर और श्वान की कथा में हुआ था।

राजा ने हुक्म दिया कि उसे शेर और श्वान की कथा सुनाई जाए। तब एक वरिष्ठ किस्म के राजभक्त ज्योतिषाचार्य ने कथा प्रारम्भ की—

एक जंगल में शेर नामक एक राजा था। वह खानदानी राजा था और पिछली कई पीढ़ियों से राज करता आ रहा था। उस जंगल का भी यही नियम था कि शेर का बच्चा ही शेर के बाद राजगद्दी पर बैठता। जंगल के अनेक जानवरों का समर्थन राजा को था, लेकिन श्वान नामक एक प्राणी हमेशा राजकाज के कामों में विघ्न डालता रहता था। यह प्राणी बहुत महत्त्वाकांक्षी था, उसकी सारी शक्ति उसके पूंछ में थी। इस पूंछ के प्रताप से उसने अपनी तरह अनेक पूंछ वालों को अपने साथ मिला लिया था और वह उनका नेतृत्व करता था। उसकी पूंछ की विशेषता यह थी कि वह टेढ़ी थी। यह टेढ़ापन ही उसकी शक्ति का प्रतीक था। उसकी इच्छा थी कि वह राजा का विश्वास प्राप्त कर इस जंगल में राज करे और राजसी सुविधाएं भोगे, उसने अपने गुप्तचरों से राजा को यह संदेश भी भिजवाया कि यदि शेर उसे अपने साथ रखने के लिए तैयार हो, तो वह जंगल में यह उठा-पटक बन्द करने को तैयार है।

शेर ने अपने सहयोगियों से सलाह ली और श्वान के संदेश पर विचार किया। राजज्योतिषी से पूछने पर पता चला कि श्वान की पूंछ में ऐसी शक्ति है कि यदि उसे सीधा नहीं रखा गया तो उसके राजयोग की पूरी सम्भावना है तथा उसका राजा के साथ रहना राजा के लिए कभी भी घातक हो सकता है।

जब शेर ने इसका निदान पूछा तो राजज्योतिषी ने बताया कि यदि श्वान की पूंछ में पोंगली पहना दी जाए, तो उसकी पूंछ सीधी हो जाएगी, और जब तक पूंछ सीधी रहेगी वह राजा की व्यवस्था में घातक सिद्ध नहीं होगी ।

शेर ने अपने गुप्तचरों से श्वान को यह संदेश भिजवा दिया कि राजा उसके संदेश का स्वागत करता है, लेकिन राज परम्परा के अनुसार बिना पोंगली संस्कार के उसे अपने साथ शामिल करना राजा को स्वीकार नहीं है। यदि राजा का यह प्रस्ताव उसे मंजूर हो, तो पोंगली समारोह का भायोजन करके उसे शामिल किया जा सकता है। राजा के साथ शामिल होने पर उसे समस्त राजकीय सुविधाएं प्रदान करने का वचन राजा देता है।

श्वान चूंकि महत्त्वाकांक्षी था, उसने शेर का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। फिर जंगल में पोंगली संस्कार समारोह का विशाल आयोजन किया गया। श्वान अपने अनेक साथियों सहित पोंगली पहनकर राजा के साथ रहने लगा। इस तरह श्वान के दिन फिरे। वह अपनी आदत के अनुसार पूंछ भी हिलाना चाहता था, लेकिन व्यवस्था की पोंगली इतनी टाइट थी कि उसकी पूंछ की सारी शक्ति नष्ट हो चुकी थी ।

इस कथा का सार यह है कि राजा को कूटनीति जानना जरूरी है । यदि पूंछ से राजकाज में विघ्न पैदा होने की सम्भावना हो, तो पूंछ में पोंगली पहनाना जरूरी है। महत्त्वाकांक्षियों को वश में करना हर राजा का पहला कर्तव्य है। टेढ़ी पूंछ वालों को राजकीय सुविधाएं देने से राजकाज के कामों में विघ्न पैदा नहीं होते तथा जब तक पूंछ पोंगली में रहती है, हमेशा सीधी रहती है ।

शेर और श्वान इस समझौते के बाद जंगल में शान्तिपूर्वक रहने लगे जिस तरह इस शेर को सफलता मिली, हमारे राजा को भी मिले।

कथा सुनने के बाद राजा ने राज ज्योतिषियों को इनाम दिए और अपने मातहतों को बुलाकर उद्योग की महत्ता पर भाषण देते हुए जंगल में एक विशाल पोंगली निर्माण का कारखाना बनाने की घोषणा की। राजा ने यह घोषणा भी की कि जंगल को प्रगति और विकास के लिए लालायित हर पूंछ का सम्मान वे करेंगे। पूंछ वालों से अपील भी की गई कि वे जंगल में स्वच्छ प्रशासन के लिए राजा को सहयोग दें, और अपने नाप की पोंगली का चयन वे खुद कर लें ।

शायद यही कारण है कि पूंछ और पोंगली की चर्चा आदिकाल से होती रही है। पूंछ ही नहीं होती तो यह प्रपंच ही क्यों होता।

-लतीफ घोंघी

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