यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

'गड़बड़गोष्ठी' का उद्घाटन | व्यंग्य (विविध)

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Author: हरिशंकर शर्मा

"भाई भोलूराम, गड़बड़गोष्ठी' का उद्घाटन तो पिछले सप्ताह ख़ूब हुआ, परन्तु उसकी चकाचक रिपोर्ट पत्रों में प्रकाशित नहीं हुई। यों चालीस-पचास पंक्तियों में छप जाने से क्या होता है। इस प्रकार के समाचार भला ऐसे छापे जाते हैं"-- मनसुख स्वामी ने बड़ी उदासीनता दिखलाते हुए कहा। "हाँ महाराज ठीक है--" भोलूराम बोले, "सचमुच ये अख़बार वाले बड़े मतलबी होते हैं। लीडरों और मिनिस्टरों की तो दिन में दस-दस बार तसवीरें छापते हैं परन्तु हमारे गुरुजी का नाम भी नहीं प्रकाशित किया। उस दिन उद्घाटन के समय अख़बार वाला मौजूद तो था, उसे भरपेट चाय भी पिलाई गयी थी, रसगुल्ले और सन्देश भी छकाये थे फिर भी भले आदमी ने ठीक-ठोक समाचार नहीं छपाये। बड़ा बुरा आदमी है।"

( इतने में ही एक अख़बार बेचने वाले का प्रवेश )

"क्यों जी, कल के अख़बार में हमारे गुरुजो को तस्वीर क्यों नहीं छपी, आज के अख़बार में भी नहीं है। आखिर यह क्या बात है?" भोलूराम ने अख़बार वाले को डांट बताते हुए कहा।
"अज़ी बाबूजी, मैं क्या जानूं, मैं तो अख़बार बेचने वाला हूँ। मैं अख़बार नहीं छापता, मैं तो बेचता हूँ।"

"देखो-देखो, यह अख़बार ठीक नहीं छापता, इसकी अकल ठीक कर दो। आया कहीं का अख़बार वाला! ठीक खबर नहीं छापता--" मनसुख स्वानी ने गरजते हुए कहा।
अख़बार वाला ज्यों-त्यों प्राण छुड़ाकर भागा। उसके बहुत से अख़बार तो वहीं पड़े रह गये । भोलूराम ने 'चापलूस' नामक अख़बार के शीर्षक धीरे-धीरे पढ़ने शुरू किए और स्वामी मनसुखानन्द ध्यानपूर्वक सुनने लगे। एक खबर के शीर्षक थे—

"माननीय मिनिस्टर के कुत्ते को जुक़ाम! 'सिविल सर्जन बुलाया गया!! सब लोग दीर्घजीवन के लिये प्रार्थना करें।” दूसरी खबर के शीर्षक--

"वीरवर धौंकलसिंह की बहादुरी! 'शिकार संसार में चमत्कार!' स्वप्न में स्यार मारा और चूहा पछाड़ा!"

तीसरी ख़बर के शीर्षक--

"सेठ सिटकूराम का महान् दान! शरणार्थियों के लिए दो टिकियाँ साबुन और तीन रूमाल! “‘कांजी हौज़' बनाने के विचार का वादा--! " सारे शीर्षक सुनकर मनसुख स्वामी बोले, "आये कहीं के अख़बार वाले! आखिर अगले ने भो तो गड़बड़गोष्ठी के उद्घाटन में तीन रुपये तेरह आने खर्च किये थे। इनका कहीं जिक्र नहीं-- समाचार नहीं। अरे, उस दिन वह अख़बार वाला गप-गप रसगुल्ला उड़ाता रहा और चप-चप चाय पी गया, उसने भी कुछ नहीं छपवाया? बड़े विचित्र होते हैं, ये अख़बार वाले।”

"महाराज, ठीक कह रहे हैं," भोलूराग ने कहा--'आखिर वह अख़बार वाला हमारा कोई सगा-सम्बन्धी था, जो उस दिन उसकी सबसे ज्यादा खातिर की गयी। अरे यही तो सोचा था कि वह हमारे गुररुजी की तसवीर सव अख़बारों में छपवा देगा | परन्तु उसने कुछ नहीं किया! आया कहीं का अख़बार वाला!"

“टटोलूराम भी गड़बड़गोष्ठी' के एक 'आनरेरी मेम्बर' हैं। अर्थात् टका-पाई खर्च किये बिना रोज चाय और टोस्ट का टेस्ट लेते रहते हैं। आप बोले--"अजी, ये अख़बार वाले बड़े निकम्मे होते हैं, देखा, भोलू भाई ने डांट पिलाई तो वह छोकरा कैसी हुच-हुच करने लगा। भाग गया, नहीं तो सारी 'अखबारी' निकल जाती! मेरी राय में तो गड़बड़गोष्ठी' का अपना ही अख़बार निकलना चाहिये, तभी हमारे सब समाचार ठीक-ठीक छप सकेंगे।"

यह सुनते ही मनसुख स्वामी की बाछें खिल गई और बड़े उत्साह से बोले, "अवश्य, अवश्य! अपना ही अखबार निकालो, तभी काम चलेगा तभी! बोलो कितना खर्च चाहिये।"

भोलू-- "अजी खर्च-वर्च क्या, वह तो भक्तों से मिल ही जाएगा। उसकी क्या चिन्ता! सोचना तो यह है कि 'अख़बार वाला' कहाँ से आवेगा? यानी उसे निकालेगा कौन?”

स्वामी-- "अजी, उसी अख़बार वाले छोकरे को कुछ दे - दिला देना, जिसको कल डाटा-डपटा था। रोज़ छापकर दे जाया करेगा।"

टटोलू-- "बिल्कुल ठीक है! उस छोकरे से जो कुछ चाहेंगे छपवाएंगे। आखिर हमारा नौकर जो होगा।"

भोलू—"और क्या नहीं, तनुखाह उसे किस बात की मिलेगी। टटोलू, क्या तुम 'अख़बार वाला' नहीं बन सकते। घर के आदमी हो। अच्छा रहेगा।"

स्वामी-- "नहीं, टटोलू 'अख़बार वाला' बनने लायक़ कहाँ पढ़ा है। वह इस काम को कैसे कर सकेगा।"

भोलू--"हाँ, ऐसा ही खयाल है। अगर टटोलू तुम इस काम को संभाल लो तब तो कहना ही क्या—“

टटोलू-- "नहीं, काम तो बहुत आसान है। पढ़ाई भी मेरी काफ़ी हुई ह। मोटे-मोटे अक्षरों को अच्छी तरह उखाड़ लेता हूँ। दर्जा दो में चार बार फेल होकर पढ़ना छोड़ दिया था, नहीं तो अब तक मिडिल पास कर लिया होता।"

भोलू--"हूँ, इतना पढ़ा-लिखा भी 'अख़बार वाला' न बना तो कौन बनेगा। अख़बारवालों को काम ही क्या है। वे तो औरों की भेजी खबरें छापते रहते हैं। यहाँ की ख़बरें तो हम लोग लिख ही लिया करेंगे।"

स्वामी--"अच्छा, अख़बार का नाम क्या होगा?"

भोलू-- 'गड़बड़गोष्ठी' के अख़बार का नाम " गड़बड़झाला” होना चाहिए।"

टटोलू--"मैं तो पसन्द करता हूँ। स्वामीजी से और पूछ लो--"

स्वामी-- "अजी, नाम तो सब अच्छे हैं। 'गड़बड़झाला' भी बहुत अच्छा है। मतलब तो अपने यहाँ के समाचार छपाने से है--"

भोलू--"अच्छी बात है, तो 'गड़बड़झाला' ही नाम रहा। और 'अख़बार वाला' रहे टटोलूराम। वस, कल से ही काम प्रारम्भ कर दिया जाए। ठीक है न--"

टटोलू--"छपाई कहाँ होगी, उसकी क्या व्यवस्था करनी चाहिए।"

स्वामी-- "भाई, हम तो जानते नहीं, किसी छापे वाले से पूछो।"

टटोलू--"अजी मैं छापे की नस-नस समझता हूँ। सवा सात बरस 'खैराती खाँ प्रेस' की मशीन का पहिया चलाते-चलाते छापे का पूरा जानकार हो गया हूँ।"

स्वामी--"तब तो क्या कहने हैं टटोलू! तुम तो छिपे रुस्तम निकले। 'अख़बार वाला' भी तुम्हीं और 'छापा वाला' भी तुम्हीं! बस काम बन गया। पर, भाई मेरी तसवीर कैसे छपेगी।"

टटोलू--"महाराज, कल सवेरे ही आपकी तसवीर खिचवा कर 'अख़बार पर चिपका दो जाएगी। फिर, प्रेस की चक्की के गल्ले में डालते ही अख़बार आटे की तरह छप-छप कर निकलने लगेंगे। तसवीर भी साथ ही साथ छपती जाएगी। यही तरीक़ा छपाई का होता है।"

भोलू--"वाह, ख़ूब-ख़ूब! टटोलू तुम तो सब समझते हो। बस काम बन गया। अच्छा, अब चाय पी लें, बटलोई का पानी उबल-उबल कर ऊपर आ रहा है।"

स्वामी-- "लाओ, भाई पहले मेरा लोटा भर दो। ज़रा दूघ ज्यादा डालना। चीनी तो मेरी चाय में अधिक पड़ती ही है।"

टटोलू-- "अरे आज तो मारे जाड़े के कमर कमान हुई जा रही है। कल के बचे-खुचे रसगुल्ले और खस्ता कचौड़ियाँ तो निकालो, कोरी चाय किस काम की! अरे वह मेवा की पोटली कहाँ गई। बिना उसके मजा नहीं आएगा।"

भोलूराम-- "घबराते क्यों हो, यार! सब चीजें मौजूद हैं। खूब खाओ-पियो। यह तो 'गड़बड़गोष्ठी' है। कल से तो अख़बार निकालना हो है। उसमें मोटे-मोटे सेठों को खूब खरी-खोटी सुना-सुना कर करारे दाम ऐठेंगे। फिर तो दिन में छह-छह बार 'गोष्ठी' चलेगी। मेवा, फल और मिठाइयों के ढेर लगे दिखाई देंगे। आखिर 'गड़बड़गोष्ठी' है कि हँसी-खेल!"

-हरिशंकर शर्मा
[1959]

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