मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।

ढूंढ़ते रह जाओगे | हास्य व्यंग्य (विविध)

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Author: प्रेम विज

जनता और नेता का सम्बन्ध घी और खिचड़ी जैसा नहीं होता, बल्कि दुल्हा और बारात जैसा होता है। दुल्हा दुल्हन को लेकर फुर हो जाता है और बराती बेचारे खाना खाते रह जाते हैं। बरातियों की विशेषता जन की तरह होती है। बरातियों को चाहे जितना भी स्वादिष्ट भोजन परोस दिया जाए लेकिन वे उस में भी कोई न कोई नुक्स जरूर निकाल देते हैं। नेता जी भी मंत्री पद मिलते ही आलोप हो जाते हैं। जनता नेता में नुक्स निकालती रहती है। नेता जी ने चुनाव के समय चाहे जन की कितनी भी सेवा की हो, यहां तक कि पैसा पानी की तरह बहाया हो, लेकिन जन हमेशा नेता से नाखुश रहते हैं। इसलिए गद्दी मिलते ही नेता जी जन से दूर चले जाते हैं।

एक अन्य कारण यह भी है नेताओं ने भी जनता को बहुत हसीन सपने दिखा रखे होते हैं। जन इन हसीन सपनों के जाल में फंस कर नेताओं को अपने ऊपर हकूमत करने के लिए भेज देती हैं। नेता भी चुनाव जीतने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं कभी सस्ती चीजें दिलाने, कभी उनके मकान पक्के करने के वायदे करता है। इन सपनों में जन को डूबोने के लिए वे दारू भी पिलाते हैं।

नेता जी के लिए चुनाव जीतना अब आसान नहीं रहा, पहले नेताओं के दर्शनों के लिए जनता खुद भागी चली आती थी। नेता की भगवान की तरह पूजा होती थी। चुनाव में ज्यादा खर्च भी नहीं होता था। अब तो चुनाव शादी से भी ज्यादा खर्चीले हो गये हैं। चुनाव के लिए बड़े-बड़े समारोह किये जाते हैं। बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाये जाते हैं। इन समारोहों में जनता स्वयं नहीं आती है। उन्हें दाम देकर लाना पड़ता है, सिर्फ यही नहीं बल्कि उनके खाने पीने का भी इंतजाम करना पड़ता है। इसलिए अब चुनाव, चुनाव न रह कर कारोबार बन चुका है।

ज्यों ही नेता जी चुनाव जीत जाते हैं सब से पहले जन से दूर हो जाते हैं। फिर मंत्री पद हासिल करने पर वे जन से और ज्यादा दूरी बना लेते हैं। इसके पीछे कई रहस्य हैं। जनता ने उन्हें चुना नहीं होता, बल्कि नेता जी के वोटों ने उन्हें खरीदा होता है चुनाव में जितनी रकम लगाई होती है वे पद मिलते ही उसकी वसूली शुरू कर दी जाती है।

जन का क्या वह फिर से खरीद ली जायेगी। नेता जी राज गद्दी मिलते ही अपना शहर छोड़ राजधानी में रहना शुरू कर देते हैं। राजधानी में पहुंचना आम आदमी की हद में नहीं होता। यदि कुछ लोग हिम्मत और पैसा खर्च कर राजधानी पहुंच भी जाए तो उन्हें मंत्री के घर के बाहर सुरक्षा गार्ड ही अन्दर घुसने नहीं देगा। यदि किसी ने बहुत पहचान निकाल कर अंदर घुसने की हिम्मत कर भी ली तो आफिस में बैठा बाबू पहले तो देर तक टैलीफोन पर बातें करता रहेगा और ज्यों ही आप पूछने की कोशिश करेंगे,वह आपको अंगुली को मुंह पर रख कर चुप रहने का इशारा करेगा। जब वह टेलीफोन से मुक्त हो जाता है तो फिर वह आप से पूछेगा क्या काम है, यह प्रश्न सुनकर आम आदमी घबरा कर काम तो क्या अपना नाम भी भूल जाता है। मंत्री जी के पास मिलने ज्यों ही किसी व्यक्ति की पर्ची पहुंचती है तो वह भीतर से ही संदेश पहुंचा देते हैं। जिन सज्जन पुरुषों ने चुनाव में तन और धन से सेवा की होती है उन्हें मंत्री जी तुरन्त अंदर बुला लेते हैं। बाकी के बारे में बता दिया जाता है कि मंत्री जी बहुत व्यस्त हैं फिर कभी मिलने के लिए आएं। जो व्यक्ति सुबह सवेरे घर से निकल कर बसों में धक्के खाकर मंत्री के आवास पर पहुंचा हो जब उसे यह कह दिया जाए फिर आना तो यह शब्द आसमानी बिजली की तरह उस पर गिरते हैं।

मंत्री जी अपने चुनाव क्षेत्र में आने से कतराते रहते हैं, क्योंकि वहां सिवाय लोगों की शिकायतों के कुछ भी सुनने को नहीं मिलेगा। दूसरा उन्होंने जनता को जो हसीन सपने दिखा रखे होते हैं वह सभी हवा में उड़ रहे होते हैं। यदि कोई समर्थक मंत्री जी को बुला ले तो भागे चले आते हैं। क्योंकि उसका तमाम खर्च उस समर्थक ने उठाना होता है। टी पार्टी में वह अपने पसंद के लोगों को बुलाता है। चुनाव क्षेत्र में पहुंच कर मंत्री जी अपने घर नहीं ठहरते बल्कि सरकारी बंगले में लाव लश्कर के साथ ठहरते हैं। यहां पर भी काली वर्दी पहने कमांडों आम आदमी को मंत्री के पास नहीं फटकने देते। सुनहरी सपनों में घिरी जनता अपने नेता को ढूंढ़ती रह जाती है।

--प्रेम विज
  कोठी 1284, सेक्टर 37बी
  चंडीगढ़-160036

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