हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

मेरे हिस्से का पूरा आसमान (कथा-कहानी)

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Author: डॉ. कुमारी स्मिता

मैं जब भी अपनी बालकनी से झाँक कर ऊपर का आसमान देखने की कोशिश करती हूँ और वह पूरा नहीं दिखता, तो बालपन का भरा-पूरा संसार आज के अधूरेपन पर जरा रुष्ट सा हो जाता है।और, याद आता है हमारे घर की वह छत! वह विस्तृत छत! जिसका विस्तार सीने में धड़कते दिल जैसा ही था। जहाँ से हमारा पूरा संसार दिखाई देता था। आज भी वही यादें हमें संपन्न बनाए हुए हैं।वरना, हमें गरीबी और अमीरी का फर्क समझ में ही नहीं आता।

वह छत जिस पर गर्मी की बेशकीमती शाम और रात बड़े इत्मीनान से ठंडी हवाएँ खाते हुई बितती थी। सर्दियों में पूरी की पूरी दोपहर धूप में बिताई जाती थी। जहाँ हम खाने-पीने से, गप्पे मारने,पढ़ने और सोने तक का काम किया करते थे। जीवन के अनमोल पल थे वे ! उन्मुक्त मन से और बिल्कुल बेफिक्री से, उन्मुक्त गगन के नीचे का हमारा पूरा संसार! बालपन से लेकर किशोरावस्था तक के सपनों की उड़ान भरते हम! बस वहाँ लेटे-लेटे ही उड़ते थे। पंछियों को देखकर उड़ते। हाँ,उड़तें ही तो थे, उस अनंत नील गगन में ! उस निस्सिम आकाश में! और हमारे साथ में उड़ती हमारी कोमल भावनाएं, हमारे आधे-अधूरे स्वप्न। हमारी हजारों खट्टी-मीठी बातों का सिलसिला, जैसे इंद्रधनुष बना देता था, उस खुले आसमान पर। मन के धागों से बंधे अरमान की पतंगें, कई बार उस छत पर उड़ाए हमने! खासकर तब, जब किशोरावस्था की कच्ची-पक्की ख्वाहिशें और भविष्य हमारी मुट्ठी में बंद थे। हमारा मन पतंग की तरह ही उड़कर कहीं से कहीं पहुँच जाता था।

आज भी मेरे मन के आसमान पर उस छत की सुबह और शाम का चित्र रेखांकित है। जहाँ चिड़ियों की चहचहाहट भोर का अभिनंदन करती थी। जहाँ सूरज की लालिमा आने के पहले ही संदेश दे देती थी। उस उगते सूरज का पूरा का पूरा प्रतिबिंब हमारे अंतर्मन में समाया हुआ है। हमारे छत के सामने दिखने वाले उस तालाब में पूरा का पूरा सूरज उतर आता था। जहाँ जीवनदायिनी जल स्थिर चित्त होकर सूरज के लिए अपना आँचल फैलाये प्रतिक्षा करती। जब सूरज की लालिमा उस तालाब में छिटकती तो पूरा का पूरा संसार स्वर्णिम दिखता था। वह दिव्य दृष्य सम्मोहित किए बिना नहीं रहती। सूरज से फूटती किरणें स्वर्णरेखाओं सी जान पड़ती थी। जिसके छू लेने मात्र से बेजान धरती की कोख में खुशियों के अंकुर फूटते।

वहीं शाम को पश्चिम का डूबता सूरज देदीप्यमानता की पराकाष्ठा को पार कर गोधूलि बेला में अपने घर विश्राम के लिए जाने लगता था। जैसे, हमारी तरह थक कर वह भी अपनी माँ के ममत्व में लिपटकर सोने चला गया हो। और, यह वादा करके जाता था कि रात बिताकर सुबह तरोताजा होकर फिर अपने नियत समय पर जरूर वापस आ जाएगा।

कई बार गर्मी की रातों में जब हम छत पर सोते, तो छत के ऊपर का आसमान बिल्कुल साफ दिखाई देता था। चाँद और टिमटिमाते तारे दिखाई देते थे। चाँद और तारे हमें बता देते थे कि अंदाजन वक्त क्या हो रहा होगा? सुबह का ध्रुव तारा हमें बता देता था कि वक्त क्या हुआ होगा? उस समय ब्रह्म मुहूर्त का महत्व बहुत अच्छी तरह समझाया गया था हमें।। सुबह कभी पढ़ने का समय बताती, तो कभी माँ के लिए पूजा के फूल लाने का समय बता देती थी। दिन में सूरज की दिशा और दशा कभी दोस्तों के साथ खुले मैदान में जाकर बैडमिंटन और कबड्डी खेलने का समय बताती थी, तो कभी लुकाछिपी करने का। उसी खुली छत पर खड़ा एंटीना दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत की कथा बताता तो कभी रंगोली के मधुर-मधुर गीतों की रंगमाला बिखेरता। पर कुछ ना कुछ हमें बताता जरूर!

वह खालीपन जो आज कभी-कभी चुभता है, उसके लिए तो हमारे पास वक्त ही नहीं बचता था। फुर्सत के व्यस्ततम दिन थे वो!

हम इतने व्यस्त होते थे, कि कभी गीली मिट्टी से घरौंदे बनाते, कभी चाचा चौधरी वाली कॉमिक्स या चंपक पढ़ते नजर आते। कभी चटाई डालकर छत पर सो जाते थे। आज उन्हीं फुर्सत के क्षणों में जब हमें उबन होने लगती है, तो हम मॉल की खरीद बिक्री में व्यर्थ का समय बिता लेते हैं। यह सिर्फ एक तुलनात्मक दृष्टिकोण नहीं, यह पूरा का पूरा जीवन था।

जहाँ आज बालकनी की स्टैंड पर सूखते कपड़े बड़े मायूस से दिखाई देते हैं। वहीं कभी-कभी मुझे लगता है कि, हमारे छत की तार पर टंगे कपड़े बड़े आत्मसम्मान के साथ लहराते थे। बड़े ही शानो-शौकत से हवा में फरफराते हुए सूखते थे।

उसी खुली छत से दिखते थे, नीम और नींबू के पेड़। और चारो तरफ की हरियाली। उस हरी-भरी नीम के पेड़ के ऊपर दिखता था घोंसला। दिखती थी, चिड़िया अपने चूज़ों को खिलाते हुए। हमारे जैसे वात्सल्य के भूखे चूज़े और ममता बरसाती उनकी माता! कभी-कभी अपने बच्चों को उड़ान भरने की ताकत देती। उनके पंखों में जान भरती। उन्हें सबक सिखाती थी गिरने और संभलने का। बिल्कुल हमारे ही माता-पिता की तरह ही जीवन का पाठ पढ़ाते पंछी! उन्मुक्त गगन में उड़ते पंछियों की तरह ही हमारा मन भी लहराता था। पपीहे की आवाज ऋतु बता देती थी, तो बुलबुलो का चहचहाना जीवन के होने का संदेश देती थी। कभी-कभी कौये की काँव-काँव की आवाज मेहमान के आने का सूचना भी दे देती थी। भोले मन को हर बात सच्ची और अच्छी लगती थी। कानों में गूंजते हुए पंछियों के स्वर हृदय में उतर आते थे।

उस छत से कई बार जुगनू भी देखे हमने। जो शायद, वक्त के साथ कहीं-कहीं कैद हो गए या बिल्कुल विलुप्त हो गए या फिर महानगर के चकाचौंध में उनकी रोशनी कहीं खो गई है। जो अमावस की रात में बड़े अद्भुत दिखते थे। ऐसा लगता था जैसे आसमान के हजारों तारे उतर कर जमीन पर पेड़ों और बाँसों की झुरमुट में समा गए हैं । गजब के थे वे आसमानी जमीन के तारे!
उमरते-घुमरते बादलों के कई रंग, कड़कती बिजली की चमक, ठंडी हवाएँ, आँधी,तूफान,वर्षा सब उसी छत पर तो देखें हमने। जीवन के इंद्रधनुषी रंग दिखते थे उस आसमान पर। उस, इंद्रधनुष का हरा, नीला और गुलाबी रंग मुझे बहुत भाता था। हर रंग की अपनी खूबसूरती और हर रंग का अपना ही महत्व था। तभी तो, हर रंग को जिया हमने। जिसमें भरपूर जीवन था।

कभी पानी पर छपाक से दौड़ना और कभी बारिश की बूंदों से खुद को गीला करना, तो कभी बड़े ध्यान से झींगुर और मेंढक की आवाज सुनना। आज भी भींग जाता है मन, कल की उन बूंदों से। जो हमारे यादों की सतह गीली कर देती है। वो रिमझिम फुहारें बारिश की! सीढ़ी पर बैठकर उन बूंदों की लड़ी को निहारते हुए, उसकी ठंडक को बर्षों महसूस किया था हमने ! जो बस, बारिश के साथ ही आती थी। वो हल्की ठंडी हवाओं का झोंका था। जो, हमारे चेहरे को छुकर ऐसे गुजरती मानो जैसे हमारे गालों को सहलाती हो। उस मधुर पल और उस गुलाबी हुए गालों की लालिमा को महसूस कर अब भी हमारा सौंदर्य निखर जाता है। कहाँ ला पाते हैं आज के आज के उत्कृष्ट से उत्कृष्ट सौंदर्य प्रसाधन वह रौनक और नूर हमारे चेहरे पर!

प्रकृति का वह तरल उपहार लावण्यता और सौम्यता भर देता था हमारे चेहरे पर! कागज के फूलों की तरह संवेदनहीनता का शृंगार अब भी नहीं भाता हमें!

मुझे कई बार लगता है जैसा व्यक्ति का मन होता है,उसकी आँखें और उसका चेहरा भी बिल्कुल वैसा ही हो जाता है। हृदय की मासूमियत कहीं ना कहीं चेहरे और आँखों में बस जाती थी।

पतझड़ से बसंत तक किसी भी मौसम के प्रभाव से अछूते नहीं रहत थे हम। छत पर, सूखते अमावट और गेहूँ को बारिश आने पर लेकर ऐसे भागते थे, जैसे हमारा कोई अनमोल खजाना हो वह! जैसे, अगर वह भींग गई तो हमारी सारी संपत्ति चली जाएगी। हँसी आती है, आज उस भोलेपन पर! जो हमारे शुद्ध और पाक मन की जागीर हुआ करती थी।

उस छत से कई बार चिल्लाकर आवाज लगाया अपने दोस्तों को हमने! वह दोस्त जो आज भी पक्के यार हैं हमारे। जिनकी वजह से हमारा मन आज भी अमीर है। जो दूर होकर भी, छूटे नहीं हमसे!

उसी छत से कई बार खुले आँगन में भी आवाज लगाई। जहाँ माँ की चूड़ियों की खनक और पायल की रुनझुन बता देती थी कि वह अभी क्या कर रही होगी? कभी-कभी उस छत से नंगे पांव भागते हुए द्वार खोलने जाता था हमारा स्नेह, हमारा प्रेम और हमारा आदर उस मेहनती और जिम्मेदार पिता के लिए, जिनके गाड़ी की आवाज दिन भर के काम के बाद घर लेकर आती थी ढेरों खुशियाँ! दिन भर की कहानियाँ। मन भर कर बातें करते हम! खूब बातें!

उम्र के साथ-साथ सोच की परिपक्वता और हमारे आनंद की आजादी भी महानगर के फ्लैट की बालकनी में जैसे कैद होकर रह गई। कुछ अधूरे सपने जो आज यहाँ के व्यस्ततम जीवन में गुम हो गए या फिर इतने परिपक्व हो गए हैं कि उनका स्वाद ही हमारे जिह्वा पर नहीं चढ़ता। जो धरोहर बन कर हमारी जेहन में समा गये थे। समय के साथ रंग-बिरंगी तितलियों को पकड़ने की कला खो दी हमने। उस अंबर से सातवें आसमान तक घूम आने की कला भी हम भूल गए। धरती से आसमान तक और सागर से पर्वत तक घूम आने की कला!

उस छत का विस्तार कितना होगा, जहाँ से हमारा पूरा आसमान साफ दिखाई देता था! हमारी पूरी दुनिया दिखती थी! रात में हमारे हिस्से के चाँद-तारे और दिन में हमारे हिस्से का सूरज हमें दिखाई देता था। उस छत का पूरा जहान मेरा था! तब,मेरे हिस्से की पूरी जमीन मेरी थी और मेरे हिस्से का पूरा आसमान भी मेरा ही था!

-डॉ. कुमारी स्मिता

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