हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
निस्वार्थ स्नेह (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:चंदा आर्य

उस शाम मैं जब विश्वविद्यालय से घर पहुंची तो बच्चे कुछ रहस्य छुपाये हुए से लगे, कहने लगे कि एक चीज़ दिखानी है। डरते -डरते उन्होंने मुझे वह चीज दिखाई ......क्या चीज थी वह चीज़! 

हमारे मिट्ठू के पिंजरे में बंद एक चिड़िया। मिट्ठू तो कब का आज़ाद हो चुका था, और किसी पंछी का पिंजरे में कैद होना मुझे अच्छा नहीं लगा, सो बच्चों को जिसका डर था वही हुआ बहुत डांट पड़ी । तीन घंटे से बंद पंछी को आँगन में लाया गया और जैसे ही उसे खोला गया, वह चीं- चीं करता आँगन की नीची दीवार पर बैठ गया ............ आश्चर्य !! उसकी आवाज सुनते ही पल भर में आस-पास के पेड़ों पर छिपे उसके भाई-बन्धु आ गए और उसे अपने साथ ले गए, क्या विश्वास किया जा सकता है कि वे तीन घंटे से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे !

हम मनुष्य तो विश्वास नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा निस्पृह स्नेह, लगाव व भाईचारा हम मनुष्यों में परस्पर कहाँ देखने को मिलता है।

-चंदा आर्य

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश