भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है। - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।

दयालु शिकारी

एक घना जंगल था। एक दिन एक शिकारी उस जंगल में शिकार करने जाता है। जंगल में वह एक सुंदर हिरनी देखता है। हिरनी ने उसी समय एक शावक को जन्म दिया था। हिरनी अपने शावक के पास बड़ी शांति से चुपचाप बैठी हुई थी।

शिकारी हिरनी को शांति से बैठी हुई देखकर बहुत खुश होता है और उसका शिकार करने के लिए उसी समय अपनी बंदूक से गोली छोड़ता है। गोली हिरनी की टाँग में लगती है। शिकारी ने देखा कि गोली की आवाज सुनकर हिरनी भागी नहीं और उसकी आँखों से आँसू निकल आये हैं।

शिकारी को ताज्जुब होता है और वह फौरन हिरनी के पास जाता है। वहाँ जाकर शिकारी देखता है कि प्रसूता हिरनी ने अभी-अभी बच्चे को जन्म दिया है। शिकारी को यह दृश्य देखकर बहुत पछतावा होता है।

शिकारी तुरंत हिरनी और शावक को अस्पताल में ले जाता है। डॉक्टर की शल्यचिकित्सा से हिरनी की गोली निकल जाती है और हिरनी स्वस्थ हो जाती है। शिकारी हिरनी को फिर से जंगल में छोड़ आता है।

[ भारत-दर्शन संकलन]

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।