कबीर के नीति दोहे
साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय । मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय ॥
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान । मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥
निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय । बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ॥
- कबीरदास
तुलसीदास के नीति दोहे
मुखिया मुख सौं चाहिए, खान-पान को एक । पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक |
आवत ही हर्ष नहीं, नैनन नहीं सनेह । तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह ।
तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर । बसीकरन इक मंत्र है, तज दे बचन कठोर II
- तुलसीदास
रहीम के नीति दोहे
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान | कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहिं सुजान ।
रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय | सुनि इटलैहैं लोग सब, बाँट न लैहैं कोय ।
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग । चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग ।
- रहीम
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