विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग
दूसरा रुख | लघु-कथा (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

चित्रकार दोस्त ने भेंट स्वरूप एक तस्वीर दी। आवरण हटा कर देखा तो निहायत ख़ुशी हुई, तस्वीर भारत माता की थी। माँ-सी सुन्दर, भोली सूरत, अधरों पर मुस्कान, कंठ में सुशोभित ज़ेवरात, मस्तक को और ऊँचा करता हुआ मुकुट व हाथ में तिरंगा।

मैं लगातार उस तस्वीर को देखता रहा। तभी क्या देखता हूँ कि तस्वीर में से एक और औरत निकली। अधेड़ उम्र, अस्त-व्यस्त दशा, आँखों से छलक़ते आँसू। उसके शरीर पर काफी घाव थे। कुछ ताजे ज़ख़्म, कुछ घावों के निशान।

मैंने पूछा, "तुम कौन हो?"

बोली, "मैं तुम्हारी माँ हूँ, भारत-माँ!"

मैंने हैरत से पूछा, "भारत-माँ? पर----- तुम्हारी यह दशा! चित्रकार ने तो कुछ और ही तस्वीर दिखाई थी! तुम्हारा मुकुट कहाँ है? तुम्हारे ये बेतरतीब बिखरे केश, मुकुट विहीन मस्तक और फटे हुए वस्त्र! नहीं, तुम भारत-माता नहीं हो सकती!" मैंने अविश्वास प्रकट किया।

कहने लगी, "तुम ठीक कहते हो। चित्रकार की कल्पना भी अनुचित नहीं है। पहले तो मैं बंदी थी पर बंधन से तो छूट गई। अब विडंबना कि घाव ग्रस्त हूँ। कुछ घाव ग़ैरों ने दिए तो कुछ अपने ही बच्चों ने। ----और रही बात मेरे मुकुट और ज़ेवरात की, वो कुछ विदेशियों ने लूट लिए और कुछ कपूतों ने बेच खाए। इसीलिए रो रही हूँ। सैकड़ों वर्षों से रो रही हूँ। पहले ग़ैरों व बंधन पर रोती थी। अब अपनों की आज़ादी की दुर्दशा पर।

उसकी बात सच लगने लगी। तस्वीर का दूसरा रुख देख, मेरी ख़ुशी धीरे-धीरे खत्म होने लगी और आँख का पानी बन छलक उठी।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें


Deprecated: Directive 'allow_url_include' is deprecated in Unknown on line 0