अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
मरना होगा | कविता (काव्य)  Click to print this content  
Author:जगन्नाथ प्रसाद 'अरोड़ा'

कट कट के मरना होगा।

आओ वीरो मर्द बनो अब जेल तुम्हे भरना होगा । ।
सत्याग्रह के समर-क्षेत्र मे आ आकर डटना होगा । ।

सूर लड़ाके मरदाने हो पैर हटाना कभी नहीं ।
मरते-मरते माता का अब कर्ज अदा करना होगा । ।

वक्त नहीं है ऐ वीरो अब गाफिल होकर सोने का ।
दौड चलो मैदानों में माता का दुख हरना होगा । ।

याद करो माता का तुमने बहुत दुग्ध है पान किया ।
दुग्ध पिये की लाज बहादुर किसी तरह रखना होगा । ।

शेर मर्द हो वीर बांकुडा याद करो कर्त्तव्यों का ।
मातृ-वेदी पर हँसते-हँसते कट कट के मरना होगा । ।

[स्वतंत्रता की तोप से]
संग्रहकर्ता व प्रकाशक: जगन्नाथ प्रसाद 'अरोड़ा' बनारस

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