अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
भारतवर्ष (काव्य)  Click to print this content  
Author:श्रीधर पाठक

जय जय प्यारा भारत देश।
जय जय प्यारा जग से न्यारा,
शोभित सारा देश हमारा।
जगत-मुकुट जगदीश-दुलारा,
जय सौभाग्य-सुदेश॥
जय जय प्यारा भारत देश।

प्यारा देश, जय देशेस,
अजय अशेष सदय विशेष।
जहाँ न संभव अघ का लेश,
सम्भव केवल पुण्य प्रवेश॥
जय जय प्यारा भारत देश।

स्वर्गिक शीश फूल पृथ्वी का,
प्रेम मूल प्रिय लोक त्रयी का।
सुललित प्रकृति-नटी का टीका,
ज्यों निशि का राकेश॥
जय जय प्यारा भारत देश।

जय जय शुभ्र हिमाचल गंगा,
कलरव निरत कलोलिनी गंगा।
भानु-प्रताप चमत्कृत अंगा,
तेज पुंज तप वेश॥
जय जय प्यारा भारत देश।

जग में कोटि-कोटि जुग जीवें,
जीवन सुलभ अमी रस पीवैं,
सुखद वितान सुकृत का सीवैं,
रहै स्वतंत्र हमेश॥
जय जय प्यारा भारत देश।

- श्रीधर पाठक

 

[स्वतंत्रता की पुकार]

 

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