कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली 'मीर'।
फर्ज | लघुकथा  (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

"अशरफ मियाँ कहाँ थे आप ?"

"कहाँ थे आप ! मैं समझा नहीं सर ?"

"अशरफ मियाँ इ.ओ. सर ने औचक निरीक्षण किया तो आपकी क्लास खाली पड़ी थी। बच्चे धमाचौकड़ी मचा रहे थे
"

"सर, आप भी बच्चों जैसी बातें कर रहे हैं ! क्लास के चक्क्रर में हम अपनी इबादत जैसी जरूरी आजमाइशें छोड़ दें क्या ?"

"कमाल है अशरफ साहब, क्या आप नहीं जानते कि क्लास खाली हो तो बच्चे बातों-बातों में आपस में किसी का सर भी फोड़ सकते हैं?"

"सर जी, अगर मामला इतना संजीदा है तो स्कूल का हेड होने के नाते इसकी फ़िकर आपको करनी चाहिए
मैं अपनी इबादत का टाइम किसी को नहीं दे सकता भले ही कुछ भी हो जाए"

"ठीक है अब तो चले जाओ क्लास में
"

"पापा ! जल्दी घर चलिए, भाई जान घर में बैठे हैं और लगातार रोये चले जा रहे हैं
किसी के चुप कराये नहीं मान रहे" अशरफ सर का बेटा उन्हें पुकारता हुआ बदहवास स्कूल के अंदर आ गया

"अकीब लगातार रोये चले जा रहा है!  क्यों क्या हुआ ?"

"पता नहीं पापा, भाई जान कुछ बताएं तब न!"

"कुछ तो कहता होगा
आखिर हुआ क्या ?"

"लगता है उनकी नौकरी छूट गयी है
"



"मुस्तैदी से काम नहीं तो करेगा नौकरी तो छूटेगी ही
कम्पनी का मालिक क्या उसका चचा लगता है कि वो अपना फर्ज छोड़कर हरामखोरी करेगा और पगार भी लेता रहेगा!"


अब अशरफ सर, प्रधानाचार्य की ओर मुखातिब होकर बोले, "सर ! घर जाना जरूरी है, नहीं तो साहबजादा इस उमर में भी बच्चों की तरह सिसक - सिसक कर अपनी अम्मी का जीना हराम कर देगा न जाने हरामखोर कब सुधरेगा!"


- सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
डी-184, श्याम आर्क एक्सटेंशन साहिबाबाद
उत्तरप्रदेश- 201005 INDIA
मो:  09911127277

 

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