राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार
ऐसा क्यों? | लघु-कथा (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

'अरे आज रविवार है, हरे रामा-कृष्णा टेम्पल चलें।' पैंट-शर्ट, टाई, सुंदर जूते पहन सब तैयार हो चल दिए। 

मंदिर पहुँचे तो ज्यादातर भारतीय पाश्चात्य रंग में रंगे हुए प्रतीत हुए। पैंट-शर्ट, टाई, क़ुछ के सिर पर अँग्रेजी हैट! ...और हरे रामा-कृष्णा मंदिर के यूरोपियन लोग भगवें कपड़ों, धोती-कमीज, पैरों में खडाऊं, गले में जणेऊ, हाथ में माला और सिर पर चोटी रखे हुए दिखाई दिए। लगा, जैसे दोनों ने कपड़े बदल लिए हों! भारतीयों ने यूरोपियन और यूरोपियन लोगो ने हिन्दोस्तानी! पर मुश्किल थी तो समझने में कि हिन्दू कौन है?

मंदिर के हाल में प्रवेश किया- बैठने लगे तो एक यूरोपियन ने कहा, 'हरे रामा, हरे कृष्णा, कैसे हो?' मैनें जवाब दिया, 'अच्छा हूँ, शुक्रिया!' मैनें बैठते हुए बगल वाले भारतीय से कहा, 'नमस्कार, कैसे हो?' जवाब मिला, 'गुड थैंक्स! हाऊ आर यू?' मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई। सोचता हूँ, जहाँ यूरोपियन लोग हमारे धर्म का अनुसरण कर रहे हैं वहाँ हम हिन्दोस्तानी खुद को अँग्रेजी स्टाईल साबित करने में गर्व महसूस करते हैं। पर.. ऐसा क्यों?

- रोहित कुमार 'हैप्पी'
  संपादक, भारत-दर्शन, न्यूज़ीलैंड

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