हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
बकरी (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:वि० स० खांडेकर

किसी पहाड़ी पर रास्ते के बीच में ही एक गड्ढा था। पहाड़ी पर चारों तरफ हरियाली और झाड़-झंखाड थे। वहाँ चरने वाली बकरियों को भला वह गड्ढा कहाँ से दिखाई पड़ता!

चरते-चरते सबसे पहले नंबर की बकरी धोखे से उस गड्ढे में गिर पड़ी तो दूसरे नंबर की बकरी को लगा कि जरूर उस गड्ढे में कोई खास चीज होगी। आगे-पीछे का कोई भी विचार किए बिना वह भी उस गड्ढे में जा गिरी। एक-दो-तीन-चार-पांच सिलसिला जारी रहा।

धीरे-धीरे वह गड्ढा भरने लगा, लेकिन सबसे आखिरी बकरी ने अपनी अन्य सहेलियों का अनुकरण किए बिना, बल्कि उनके सिर पर बड़े ही शान से कदम रखकर आगे निकल जाने का साहस दिखलाया।

और आगे निकल जाने के बाद पीछे मुड़कर कहा, 'बुद्ध कहीं की! रास्ते में पड़े गड्ढे भी दिखाई नहीं देते?'

तब से इस देश में गड्ढे बनवाये जाने लगे और उन्हें इसी पद्धति से पटवाकर आगे निकल जाने का सिलसिला शुरू हो गया, जो अब तक जारी है।

-वि० स० खांडेकर
[संपादक – बलराम, अनुवाद : भातंब्रेकर, भारतीय लघुकथा कोश (भाग-1), दिनमान प्रकाशन, 1989]

*विष्णु सखाराम खांडेकर (11 जनवरी 1898 - 2 सितंबर 1976) मराठी के लेखक थे। वह प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार जीतने वाले पहले मराठी लेखक हैं।

 

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश