हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
तमाशा    (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:नफे सिंह कादयान

जून के अन्तिम पखवाड़े में सूर्य अपनी प्रचण्ड अग्नि शिखाओं से धरती झुलसाने लगा। वर्षा हुई तो लोगों को गर्मी से कुछ राहत मिली मगर बादलों ने जैसे ही आसमाँ से विदाई ली तेज धूप ने भीगी धरती को उबाल दिया। अब उमसी गर्मी में लोगों के शरीर पसीने से तर होने लगे। शाम के चार बजे अम्बाला शहर अलसाया हुआ सा चल रहा था। कमली इस शहर में आज आखिरी तमाशा दिखाने वाली थी। आज वह तीन बार करतब दिखा बुरी तरह थक चुकी थी। उसने शहर की बस्ती में एक व्यस्त सा चौक देख कर अपने बापू से रिक्शा रोकने को कहा।

कमली के शरीर में एक रक्तनदी है जो महीने में एक बार उफान पर होती है। ऐसे में वे घर पर रहना चाहती है मगर बापू की मार उसे काम करने पर मजबूर करती है। वह जैसे ही रिक्शे पर लदे असबाब के ऊपर से नीचे उतरी उसके अधोवस्त्र में तह कर रखा कपड़ा अपनी जगह से थोड़ा खिसक गया। उसने आसपास देखा। किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं था। उसने अपनी मैली-कुचैली सिलवार को थोड़ा ऊपर की तरफ खींचते हुए कपड़े को सैट किया फिर अपने सबसे छोटे भाई को गोदी में उठा कर जमीन पर बैठाते हुए रिक्शा में बैठे अपने भाई बहनों से बोली, “चलो जल्दी से सभी नीचे उतर जाओ।“ जब तक उसके मदारी बापू ने पसीने से तर अपनी उबड़-खाबड़ दाढ़ी को तोलिये से पोंछा लगाया और सभी नीचे उतर रिक्शा पर लदा सामान उतारने लगे।

सबसे पहले उन्होंने स्टूल उतारा फिर डोरूए कपड़ों की गठरी ओर अन्य समान उतार कर चौक के एक कोने पर सजा दिया। मदारी ने बंडल से निकाल बीड़ी सुलगाते हुए रिक्शे के नीचे देखा। उसके पीछे बांधे गए बन्दर-बन्दरिया तेज धूप से बचने के लिये एक्सल पर बैठे थे। उसने उनकी रस्सी खोल कर बाहर निकाला और अपने छोटे लड़के के हाथ में पकड़ा दिया। फिर बीड़ी का एक जोरदार सुट्टा लगाते हुए बच गए टोटे को बुझा कान के ऊपर रखते हुए वह बांसुरी बजाने लगा। वह कुछ देर बांसुरी बजाता फिर उसे मुंह से हटा हाथ में पकड़े डोरू पर जोर से गिरदड़ी लगाता हुआ ऊँची आवाज में चीख-चीखकर लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने की कोशिश करने लगता, “भाई लोगो, बात सुनना जरा गौर से, फिर बात करना किसी ओर से।“ “आओ, आओ... सभी भाई बहन...चिंकू, टिंकू, पिंकू मैदान में आ जाओ। ये मदारी अपको आज ऐसा तमाशा दिखाने वाला है जो आपने अपने जीवन में कभी नहीं देखा होगा--
“देखो बंदरिया डांस दिखाए, अपने बंदर को भरमाए
बंदर बैठा पहन के खादी, आज करेंगे इसकी शादी।“

“आ जाओ, भाई लोग... बच्चे, बूढ़े, जवान सब आ जाओ। देखो ये लड़की आपको ऐसे-ऐसे जानलेवा कमाल दिखाएगी जो आपने अब तक बड़ी से बड़ी सर्कस में भी नहीं देखे होंगे।“

कमली और उसके अन्य भाई-बहन भी अपने बापू का साथ देते हुए मैदान में उल्टी-सीधी कलाबाजियां खाने लगे और अन्य कई प्रकार की भाव-भंगिमाएं बनाते हुए लोगों को अपने पास आने के लिए लालायित करने लगे।

मदारी ने करतब दिखाने शुरू किए तो वहां आस-पास के घरों से भी कुछ लोग बाहर निकलकर तमाशा देखने आ पहुंचे। बच्चे मदारी के चारों तरफ घेरा बना बैठ गए तो युवा, अधेड़ उनके पीछे खड़े हो गए। मदारी ने बंदर की शादी का प्रस्ताव बंदरिया के आगे रखा तो उसने गरदन हिला कर मना कर दिया। बंदर उसके आगे ठुमक-ठुमक कर नाच दिखाता हुआ उसकी चिरोरी करने लगा मगर वह फिर भी न मानी। जब बंदर ने कपड़े की गठरिया से गहने, क्रीम, पाऊडर निकाल कर उसे दिये तो वह मान गई।

बंदर की शादी पर वहां बैठे छोटे बच्चों ने खूब तालियां बजाई पर बड़ो को मजा नहीं आया। वह इस प्रकार के बंदरों के तमाशे अनेक बार देख चुके थे। टीवी, इंटरनेट युग में वे इनसे बोर होते थे। कुछ लोग वहां से खिसकने लगे तो कमली की बहन और भाई ने आपस में टांगों में टांगे फंसाए गेंदनुमा बन कर जमीन पर लुढ़कते हुए मैदान का एक चक्कर लगा डाला। इस बीच कमली ने बड़ा स्टूल मैदान के बीच में रख दिया और उसके छोटे भाई-बहन उसके चारों ओर ठुमके लगा कर नाचने लगे। लोग इन फटेहाल बच्चों के करतब देखने के लिए फिर कुछ देर के लिए रूक गए।

“देखो-देखो भाइयों, ये अंगूठी देखो।” मदारी मैदान का एक चक्कर लगा लोगों को अंगूठी दिखाता हुआ बोला, “अब आपके सामने ये लड़की इस छोटे से स्टूल पर केवल हाथों के बल उल्टी हो कर इस अंगूठी को आँख में दबाकर उठाएगी। अगर थोड़ी भी चूक हुई तो आँख फूट सकती है मगर पेट के लिए... माई बाप पेट के लिए... यह आपको ये जानलेवा खेल भी दिखाएगी। इस बच्ची के खेल पर खुश होकर रूपया-दो रुपये जरूर देना।”

कमली स्टूल के कोने पर अंगूठी रख उसके ऊपर चढ़ गई। गर्मी की वजह से उसका बुरा हाल था। शरीर का हर हिस्सा पसीने की बूंदें उगल रहा था। आज सुबह से ही तमाशा दिखाते समय कपड़ा खिसकने का भी डर बराबर बना हुआ था। किशोरियों की माएं उन्हें इस बारे कुछ हिदायतें देती हैं मगर उसकी माँ पहले ही स्वर्गवासी हो चुकी थी। दुपट्टे को कमर से बांधते हुए कमली ने अपने उस सबसे छोटे भाई की तरफ देखा जिसके पैदा होते समय उसकी माँ मरी थी। वह रिक्शा के नीचे मिट्टी में खेलता हुआ लोट-पोट हो रहा था। वह उधर से ध्यान हटा अपने दोनों हाथ ऊपर करके धीरे-धीरे पीछे की तरफ झुकने लगी। उसने कमान की तरह उल्टी हो स्टूल पर अपने हाथ टिकाए तो उसकी कमर ऊपर उठ गई जिससे पसीने से लथपथ कुर्ती में उसके अर्द्ध-विकसित उभार अधिक नुमाया होने लगे। यह देख तमाशा छोड़ कर जाने का मन बना रहे कुछ युवा लड़के और पुरूष वहीं जम गए। कमली अब उनके इस वासनात्मक भाव को थोड़ा बहुत पहचानने लगी थी। उसने अपनी कमर थोड़ी ओर ऊपर उठाते हुए अंगूठी उठाई और अदा के साथ दोनों हाथ फैला कर खड़ी हो गई।

कमली के इस करतब पर लोगों ने खूब तालियां बजाई और एक सज्जन पुरूष ने खुश हो कर उसके हाथ पर दस का नोट भी रख दिया। इस बीच मदारी ने अपनी दूसरी लड़की के हाथ में कटोरा पकड़ा कर मैदान का एक चक्कर लगवा डाला। लोगों ने उसमें चवन्नी अठन्नी, रूपया-दो रूपया डाल दिया। फिर मदारी ने बांसुरी बजा कर एक गिरदड़ी डोरू पर लगाई और कमली की तरफ इशारा कर दोबारा बोला, “अब यह लड़की आपको एक ब्लेड आँख से उठाकर दिखायेगी। जी हाँ, एक ब्लेड... और वह भी नया धारधार ब्लेड। माई बाप अगर आँख में लग गया तो आँख कट सकती है पर पापी पेट के लिए सब करना पड़ता है। डालिए... डालिए इस छोटी बच्ची के कटोरे में रूपया-दो रूपया जो भी हो डाल दीजिये।“

कमली ने अपने दुपट्टे से पसीना पोंछते हुए ब्लेड को स्टूल के किनारे की तरफ रगड़कर सीधा खड़ा किया और दुबारा स्टूल पर चढ़ गई। वहां मौजूद बच्चे रोमांच और खौफ़ के साथ तमाशा देखने लगे पर कुछ पुरुषों की आंखों में वासना के डोरे थे। कमली ने आसानी से ब्लेड को पलकों से उठाया ओर खड़ी हो गई। फिर उसने इसी प्रकार से एक कमीज का बटन और सुई पलकों से उठा कर दिखाई। लोगों ने उसके इन करतबों पर खूब तालियां बजाई।

“ये पांच फुट लम्बा, चार इंच मोटे लोहे का मजबूत सरिया देखो माई बाप। अब आपके सामने ही ये मासूम इससे ऐसा करतब दिखाएगी जिसे देख आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।“ मदारी एक लम्बा सरिये का टुकड़ा हाथ में ले मैदान का चक्कर लगाता हुआ आगे बोला, “आपके सामने ही ये दुबली-पतली लड़की इसे अपनी गरदन पर रख कर दबाएगी जिससे सरिया मुड़ कर दोहरा हो जाएगा। ये सरिया इस की नाजुक गरदन में घुस कर इसे घायल भी कर सकता है माई बाप... पर पापी पेट के लिए सब करना पड़ता है। तो देखिये इस लड़की का कमाल ओर इसकी हौसला अफजाई के लिए दिल खोलकर रूपया-दो रूपया, पांच- दस रूपया दीजिये।“ मदारी तमाशे का अंतिम करतब करने के लिए कमली को इशारा कर कान से बची हुई बीड़ी का टुकड़ा निकाल कर पीने लगा।

कमली सुबह से कई बार तमाशा दिखा कर बुरी तरह थक चुकी थी। आज वह उस कपड़े को लेकर भी परेशान थी जो सुबह से कई बार खिसक चुका था। वह लोगों से नजरे बचा बड़ी मुश्किल से उसे ठीक कर पाती थी। उसने दयनीय भाव से अपने बाप की तरफ देखा। शायद वह उसकी परेशानी समझते हुए उसे यह करतब करने से मना कर दे मगर वह रिक्शा के पास खड़ा हो आराम से बीड़ी के सुट्टे लगा रहा था। वह उस छड़ी को याद कर कांप कर खड़ी हो गई जिससे उसका बाप बंदरों को आइटम सिखलाता था। मदारी की नजर में जानवर और वह एक बराबर थे तभी तो उसे शरीर को तोडऩा-मरोडऩा सीखते समय छड़ी की कई बार मार सहनी पड़ी थी।

कमली अनमने मन से अपने दुपट्टे को कसकर अपनी कमर से बांधते हुए अपनी छोटी बहन की तरफ देखने लगी। उसको छड़ी की मार न पड़े इसलिए अब वह हर रोज उसे बड़े प्यार से तमाशे का हर करतब सिखलाती थी। माँ की मौत के बाद उसे ही सब बच्चों की देखभाल करनी पड़ रही थी। वे लोग शहर की उस मलीन बस्ती में झुग्गी डाल कर रह रहे थे जहां बिजली पानी जैसी कोई सुविधा नहीं थी। बस्ती में सांसद, विधायक, नगरपालिका प्रधान बनने के लिये पांच साल में एक बार वोटों के समय आते थे। बस्ती सुधार के लिये बड़े-बड़े वादे किए जाते फिर उनकी शक्ल पांच साल बाद ही नजर आती थी।

कमली का बाप दिन भर तमाशा दिखा जितना कमाता उसमें से आधे की दारू पी जाता। उसकी माँ जिंदा थी तो वह उसका पुरजोर विरोध करती थी। वह माँ को अकसर डांट कर कहता, “मेरी कमाई है जैसे मर्जी लुटाऊं।” अगर अधिक विरोध करती तो वह उसे गंदी-गंदी गालियां देता हुआ छड़ी से पीटने लगता था। अब रोटी बनाने, सबसे छोटे बच्चे को नहलाने-धुलाने की सारी जिम्मेदारी कमली के कंधों पर आ गई थी। वह अपने पांच भाई-बहनों की देख-रेख से बहुत परेशान रहती। मन ही मन सोचा करती थी कि काश उनका छोटा परिवार होता तो वे भी आराम से रह सकते थे। छोटे परिवार में बाप के दारू पीने के बावजूद भी उनके पास इतना तो बच ही जाता कि दो वक्त की रोटी अच्छी प्रकार से नसीब हो जाती।

कमली ने एक नजर वहां खड़े सभी लोगों पर डाली ओर अपने गले में बंधे लाल डोरे को हाथ से टटोल कर देखने लगी। उसने उसमें बंधे एक रूपये के सिक्के को इस प्रकार छू कर देखा जैसे वह बहुत कीमती चीज हो। जब भी वह सरिया मोडऩे वाली आइटम करती उसे हाथ लगा कर अवश्य देखती थी क्योंकि ये ही सिक्का सरिये को उसकी गरदन में घुसने से बचाता था। वहां नीचे बैठे बच्चे उत्सुकता से उसकी प्रत्येक गतिविधि बड़े ध्यान से देख रहे थे मगर वहां खड़े अधिकतर पुरुष अब कुछ बोरियत महसूस करने लगे। उन्हें ये मालूम था की सरिया मोड़ने के इस करतब में लड़की कमान की तरह टेढ़ी नहीं होगी जिससे उन्हें मजा नहीं आएगा।

कमली उनकी मंशा जान चुकी थी। इससे पहले लोग वहां से खिसकने लगें उसने अपना आखिरी करतब जल्दी करने का निर्णय लिया। वैसे भी उसका गर्मी से बुरा हाल था। तन पर पहने कपड़े ऐसे हो गए थे की अगर उनको निचोड़ा जाए तो दो तीन लिटर पानी निकल आए। उसने सरिया उठा कर उसके एक छोर को जमीन पर रखा और दूसरा गले में ठीक उस जगह रख लिया जहां नीचे रूपया बंधा था।
कमली के तैयार होते ही हमेशा की तरहं उसका बाप खड़ा होकर चिल्लाने लगा, “देखो- देखो... बच्चे, जवान सब देखो! कितना खतरनाक खेल है ये। देखो इस लड़की ने सरिया अपनी गरदन में फंसा लिया है। अब यह अपनी जान जोखिम में डाल कर गरदन से एक जोरदार झटका देते हुए इसे मोड़ कर दोहरा कर देगी। माई बाप इसके इस खेल पर खुश होकर इसे देने के लिए रूपया-दो रूपया अपनी जेब से निकाल लो।“

कमली ने सिक्के के ऊपर रखे सरिये के सिरे को एक बार फिर अच्छी प्रकार देख दोनों हाथ फैला कर आगे की तरफ एक झटका मारा तो सरिया मुडऩे के बजाए लचक खाकर रह गया।

मदारी ने इस सरिये को बीच में से कई बार मोड़कर बिल्कुल कमजोर किया हुआ था। कमली भी अपने गले से इसे कई बार मोड़ कर करतब दिखा चुकी थी। आज थकान और गर्मी की वजह से वह उतना जोर नहीं लगा पाई जिससे सरिया मुड़ सके। उसके धक्का मारते ही वहां खड़े लोग सरिये को न मुड़ता देख ही-ही करके जोर से हँसने लगे।

“लगता है आज रोटी खाकर नहीं आई। जरा ओर जोर से धक्का लगा रानी।“ वहां कुछ युवा लड़के चिल्ला-चिल्लाकर कमली का उपहास उड़ाने लगे।

कमली का मन हुआ की सरिये को एक तरफ फेंक कर वहां से भाग जाए मगर भूख-गरीबी और अपने बाप की लताड़ ने उसे जकड़ा हुआ था। उसने सरिया दोबारा रखने के लिए गले को हाथ लगाया तो वहां पसीने की धार बह रही थी। उसकी आँखों में भी पसीना घुस कर जलन पैदा कर रहा था। उसने सरिये पर धक्का लगाने के लिए गरदन का पूरा संतुलन बनाया तो उसे अपने अंदर से कुछ तरल सा बहता महसूस हुआ। उसे लगा जैसे कपड़ा तैर कर नीचे आ गिरेगा। लोगों की तरफ से एक बार फिर चिल्लाने की आवाज उसके कानों से टकराई तो उसने आगे से अपनी सलवार को पकड़ते हुए झुंझला कर पूरी शक्ति से एक धक्का मारा। सरिया मुड़ कर दोहरा तो हो गया मगर उसका सिक्के पर रखा छोर पसीने की वजह से फिसल कर उसके कंठ को फाड़ता हुआ उसकी गरदन में पैवस्त हो गया।

कमली को ऐसा लगा जैसे उसकी गरदन में आग लग गई हो। सांसो की डोरी टूटने से पहले उसे अन्तिम बार लोगों की तालियों की गडग़ड़ाहट सुनाई दी। फिर वह किसी कटे वृक्ष की तरह जमीन पर आ गिरी। थोड़ी देर तड़पने के बाद ही वह शांत हो गई। अब उसकी बेबसी, प्रताडऩा, लाचारी का मुक्कमल ईलाज हो गया था।

नफे सिंह कादयान
गांव-गगनपुर, जिला-अम्बाला, डाकघर-बराड़ा.133201
मोबाईल-9991809577
ई-मेल: nkadhian@gmail.com

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