हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी
दो लघुकथाएँ (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:संदीप तोमर

ज़ख्मी 

उन्हें समाजवाद से ऐतराज था... 

आज सुबह ही एक जत्था लोहिया पार्क की ओर रवाना हुआ... लाठी, डंडे, पत्थर उनके हाथों में थे।

पार्क में पहुँच जत्था राममनोहर लोहिया के बुत पर पिल पड़ा। जिसके हाथ में जो हथियार था उसका भरपूर इस्तेमाल किया। एक ने स्याही की बोतल उछाली, जिसके छींटे क्षत-विक्षत बुत पर गिर गए। दूसरा अभी जूतों के हार को गले में डालने ही वाला था कि मामले का रुख बदला। लोहिया के अनुयायी पीछे से प्रहार कर चुके थे।

पहले वाला जत्था भाग गया, हार पहनाने वाला धरा गया था।

जूतों का हार पहनाने वाला ज़ख्मी हो गया। एक समाजवादी ने कहा--"ये बहुत ज़ख्मी है, चलो इसे लोहिया अस्पताल ले चलें।"

ज़ख्मी को अस्पताल ले जाने की तैयारी होने लगी थी।

- संदीप तोमर

विडंबना

वो न जाने कब से भूखा था। उसने राजा के दरबार में गुहार लगाई। राजा ने तीन दिन बाद अपने कारिंदे को भेज भूखे व्यक्ति को भोज पर बुला लाने को कहा। जब कारिंदा उसके घर पहुंचा तब तक भूखा व्यक्ति कलश में तब्दील हो चुका था। पड़ोसी वह कलश कारिंदे को देकर बोला- "वह बूढ़ा अब इस कलश में है। राजा साहब से कहिये कि इसकी तेहरवीं पर भूखों को भोज करा दें, ताकि और कोई भूखा उम्र से पहले कलश में न जा सके।"
कारिंदे ने राजा के पास पहुंचकर कलश उन्हें देते हुए सारा किस्सा कह सुनाया।

अगले दिन शहर मे ऐलान हुआ-"कल के दिन सभी भूखों को राजा की तरफ से भोज कराया जाएगा, एक दिन शहर में कोई भूखा नहीं रहेगा।"

भूखे लोगों में फुसफुसाहट शुरू हुई, आनन-फानन में एक सभा बुलाई गयी। एक भूखे ने ऐलान कर दिया-"एक दिन के भोज की राजा की दी गई भीख का हम विरोध करते हैं, कल पूरे शहर में हम सब एक दिन का उपवास रखेंगे।"
सभी भूखे एक-एक करके सभा से जाने लगे थे...।

-संदीप तोमर

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