अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
मित्रता की परख (बाल-साहित्य )  Click to print this content  
Author:विष्णु शर्मा

एक जंगल में गाय, घोड़ा, गधा और बकरी चरने आते थे। वहीं साथ चरते-चरते उन चारों में मित्रता हो गई। वह चरते-चरते आपस में कहानियाँ कहते। वहीं एक पेड़ के नीचे एक खरगोश रहता था। एक दिन उसने इन चारों को देखा तो खरगोश उनके पास जाकर बोला, “मैं भी तुम सबका मित्र बनाना चाहता हूँ।"

सबने 'अच्छा' कहकर हामी भर दी तो खरगोश बहुत प्रसन्न हुआ। अब तो खरगोश हर रोज उनके पास आकर बैठ जाता। कहानियाँ सुन-सुनकर वह आनंदित होता। एक दिन खरगोश उनके पास बैठा कहानियाँ सुन रहा था, अचानक शिकारी कुत्तों की आवाज सुनाई दी। भयभीत खरगोश ने गाय से कहा, "तुम मुझे पीठ पर बिठा लो। जब शिकारी कुत्ते आएँ तो उन्हें सींगों से मारकर भगा देना।"

गाय ने कहा, "मेरा तो अब घर जाने का समय हो गया है।

तब खरगोश घोड़े के पास गया, कहने लगा, “घोड़े भाई! तुम मुझे पीठ पर बिठा लो और शिकारी कुत्तों से बचाओ। तुम तो एक दुलत्ती मारोगे तो कुत्ते भाग जाएँगे।”

घोड़े ने कहा, "मुझे बैठाना नहीं आता। मैं तो खड़े-खड़े ही सोता हूँ। मेरी पीठ पर कैसे चढ़ोगे? मेरे पाँव भी दुःख रहे हैं। इन पर नई नाल चढ़ी है। मैं दुलत्ती कैसे मारूँगा? तुम कोई और उपाय करो।"

तब खरगोश ने गधे के पास गया, "मित्र गधे! तुम मुझे शिकारी कुत्तों से बचा लो। मुझे पीठ पर बिठा लो। जब कुत्ते आएँ तो दुलत्ती झाड़कर उन्हें भगा देना।"

गधे ने कहा, “मैं घर जा रहा हूँ। समय हो गया है। अगर मैं समय पर न लौटा, तो कुम्हार डंडे मार-मार कर मेरा कचूमर निकाल देगा।"

तब खरगोश बकरी की तरफ चला। बकरी ने दूर से ही कहा, "छोटे भैया! इधर मत आना। मुझे शिकारी कुत्तों से बहुत डर लगता है। कहीं तुम्हारे साथ मैं भी न मारी जाऊँ।"

इतने में कुत्ते पास आ पहुंचे। अब तो खरगोश सिर पर पाँव रखकर भागा। कुत्ते खरगोश जितनी तेज दौड़ नहीं पाए और खरगोश तेज़ी से एक झाड़ी में जा छिपा। वह मन ही मन विचार करने लगा, 'हमेशा अपने पर ही भरोसा करना चाहिए।'

सीख : मित्रता की परख मुसीबत में ही होती है।

[पंचतंत्र की कहानियाँ]

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