राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार
कर्ज (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

वे वृद्ध थे। अस्सी से ऊपर की आयु रही होगी। कोरोना के कारण अस्पताल में भर्ती थे। पूरे देश के अस्पतालों में बैड, ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की किल्लत थी लेकिन उन्हें संयोग से सब उपलब्ध था।

"ये इतनी ज़ोर-ज़ोर से कौन विलाप कर रहा है?" उनकी नज़र एक युवती पर पड़ी। जो लगातार रो-रोकर अपने पति को दाखिल करने की गुहार लगा रही थी।

"मैडम, आप समझ नहीं रही हैं। हमारे पास कोई बैड खाली नहीं है। आप इन्हें कहीं और ले जाइए। आ'म सारी।"

"सर, हम तीन जगह जा चुके हैं। इनकी हालत बहुत खराब है। मैं आपके पाँव पड़ती हूँ, कुछ कीजिए।" युवती ने भर्राई आवाज़ में गिड़गिड़ाई।

"डॉक्टर साहब, सुनिए।"

डॉक्टर और युवती दोनों ने उस वृद्ध की और देखा।

"इनके पति को मेरा बैड दे दीजिए।"

"आप क्या कह रहे हैं?"

"जी, मैं सही कह रहा हूँ। मैं अपने जीवन के पचासी वर्ष पार कर चुका हूँ। मेरे जीने-मरने से अब किसी को कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ने वाला लेकिन इनकी तो ज़िंदगी पड़ी है। प्लीज, मेरी मानिए।"

"आपको दुबारा ‘बैड' मिलना मुश्किल होगा। सोच लीजिए!"

"मैंने सोचकर ही कहा है, आप उन्हें मेरा ‘बैड' दे दें।"

युवक को उनका ‘बैड' दे दिया गया। युवक बच भी गया। उसे जब पूरी कहानी पता चली तो सोचा, उस महात्मा के दर्शन तो करे। पूछताछ की तो पता चला, घर लौटने के दो-तीन दिन बाद उनका निधन हो गया।

टीवी समाचार चल रहे थे। देश का बुरा हाल था। लाशों के अंबार लगे थे। लाशों को कंधा देने को अपने सगे-संबंधी भी नहीं आ रहे थे और उस अपरिचित ने अपनी जान के बदले उसकी जान बचाई। राहुल फफक-फफक कर रो पड़ा, "मेरे सिर पर उनका कर्ज है।"

शीतल ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो आप भी फूट पड़ी, "हाँ, हमारे सिर पर उनका कर्ज है।" इस युवा युगल के कुछ सपने थे, जीवन को लेकर कुछ कल्पनाएँ थीं लेकिन अब उनकी दिशाएँ बदल चुकी थीं। उन्होंने कुछ कुछ समय पहले ही एक रेस्टोरेंट खोला था।

‘राहुल, क्यों न हम कोरोना पीड़ितों को ‘फ्री खाना' उपलब्ध करवाएँ?"

"हाँ, मैं खुद जाकर ‘डिलीवर' करूंगा।"

"हाँ, हम ख़ुद डिलीवर करेंगे।" शीतल ने हामी भरी।

उनके लिए जीवन के मायने अब बदल चुके थे।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

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