हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
पुत्रमोह | लघुकथा (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:मधुदीप

आज दस साल बाद मुझे मेरे लँगोटिया दोस्त का खत मिला है। चौंकिये मत ! समय कभी-कभी बेरहम होकर लँगोटियों के बीच भी दीवार बन जाता है। खैर, इस किस्से को यहीं छोड़कर मैं इस खत को ही आपके सामने रख देता हूँ।

Senior reading a letter

प्रिय भाई राघव !

दस साल के लम्बे अरसे के बाद आपको खत लिख रहा हूँ। समय बहुत बलवान होता है, नहीं तो साठ साल की दोस्ती क्या एक झटके में टूट सकती थी ! आप तो बिलकुल सही थे दोस्त लेकिन मैं ही उस समय पुत्रमोह में अन्धा हो गया था। आपने तो मेरा ही भला चाहा था मगर मैं न जाने कैसे कह गया था कि यदि आपकी भी कोई सन्तान होती तो आप भी वही करते जो मैं कर रहा हूँ। सुनकर आप चुपचाप वहाँ से चले गए थे। उस समय शायद मैं आपकी पीड़ा नहीं समझ सका था लेकिन आज महसूस कर सकता हूँ कि मैंने आपको कितना बड़ा आघात पहुँचाया था। आप चुपचाप उस पीड़ा को सहते रहे लेकिन एक शहर में रहते हुए भी आपने कभी लौटकर मुझे इसका उत्तर नहीं दिया। काश ! आप लौट आते या उसी समय मुझे भला-बुरा कह लेते तो आज मुझे स्वयं पर इतनी ग्लानि न होती।

आपने उस समय सही कहा था मेरे दोस्त ! हमारा भविष्य हमारे अपने हाथ में होता है। काश ! उस समय मैंने आपका कहा मानकर अपना सब-कुछ अपने इकलौते पुत्र के नाम न किया होता तो मैं इस समय आपको यह पत्र शहर के वृद्धाश्रम से न लिख रहा होता। दोस्त ! मैं चाहता हूँ कि आज आप मुझे माफ कर दो और एक बार यहाँ आकर मेरे गले से लग जाओ। आपको हमारी लँगोटिया दोस्ती का वास्ता है मेरे दोस्त !

आपका पुराना अपना, चेतन ।

नीचे वृद्धाश्रम का पता लिखा है। पाठको ! मैं पत्थर दिल नहीं हूँ। मेरी आँखों से अविरल आँसू बह रहे हैं और मेरी कार उस वृद्धाश्रम की ओर जा रही है।

-मधुदीप गुप्ता
ई-मेल: madhudeep01@gmail.com

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश