राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार
त्रासदी  (कथा-कहानी)  Click to print this content  
Author:रोहित कुमार ‘हैप्पी'

वायु सेना के इस पायलट ने कुछ ऐसा कर दिखाया कि सारा देश उसकी जय-जयकार कर उठा। लगभग 60 घंटे शत्रुओं की हिरासत में रहने के बाद भी वह जीवित अपने वतन लौट आया था। उसने दुश्मन की हिरासत में अपना मुंह नहीं खोला। अपने नाम व बैच के सिवाए उसने कुछ नहीं बताया था।

60 घंटे परायी धरती पर रहने के बाद, अपने वतन की मिट्टी पर पाँव रखते ही, उसे जो महसूस हुआ उसको वह शब्दों में ब्यान नहीं कर सकता।

बाहर हजारों की संख्या में लोग उसका नाम ‘ज़िन्दाबाद' कर रहे थे। उसके फौलादी सीने में भी भावुकता ने धीरे से अपनी जगह बना ली थी।

‘इतना प्यार, इतना सम्मान!' पलभर के लिए उसकी पीड़ा, उसकी थकान भी मुसकुरा दी थी।

कोई उसे ‘ज़िंदा शहीद' बता रहा था तो कुछ सैनिक टीवी पर उसके लिए ‘सर्वोच्च सैनिक सम्मान' की सिफ़ारिश कर रहे थे।

पूरा देश उसके साथ था। वह देश का नायक बन चुका था। अपनी सीमा पर पाँव रखते ही उच्च अधिकारी उसे लेने आए थे। प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं के बधाई-संदेश मिले थे। उसे सीधा वायु सेना के ‘हेड क्वार्टर' ले जाया गया था।

उसका परिवार उससे मिलने के लिए पहले ही देहली पहुँच चुका था।

‘वेलकम बैक, माइ सन!' उसके सेवानिवृत्त सैनिक पिता ने उसका स्वागत किया। माँ ने भरी आँखों के आँसुओं को रोकते हुए उसकी पीठ पर हाथ फेर कर दूसरी और मुंह कर लिया। उसे डर था कि कहीं वह फूट ना पड़े।

सैनिक को अपनी पत्नी और बच्चों से मिलकर अपने जीवन का रंग इंद्रधनुषी लगने लगा। पीड़ा, संताप और परायी धरती का ग्रहण उतर चुका था। अब वह अपने परिवार के साथ था और अपनी माँ की गोद में सिर रख सकता था।

"वी हैव टु गो सर!" एक सैनिक अधिकारी ने अचानक आकर व्यवधान डाल दिया।

"कहाँ? व्हेयर?" उसकी पत्नी और माँ ने एक साथ पूछा।

"दे हैव टु परफ़ोर्म सम फ़ोरमलिटिज़।" सेवानिवृत सैनिक पिता ने संतोष से कहा।

अब पिछले कई सप्ताहों से वह वायुसेना के हॉस्टल में है। उसे अपनी सरकार, अधिकारियों और जांच एजेंसियों के बीच रहकर उन्हें हर विवरण देकर संतुष्ट करना है।

"सो, विंग कमांडर...!"

Investigating

पूछे जा रहे प्रश्नों का सिलसिला थम ही नहीं रहा। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अब उसे ‘लड़ाकू विमान' उड़ाने की इजाजत नहीं होगी और शायद उसे सेवामुक्त भी कर दिया जाए!

वायुसेना के हॉस्टल के बाहर अब भी कुछ युवा नारे लगा रहे हैं -

‘विंग कमांडर...जिंदाबाद!'

उसके मन-मस्तिष्क में कुछ चल रहा है, ‘60 घंटों की इस यातना के बाद उसकी यह त्रासदी कभी ख़त्म होगी?'

- रोहित कुमार ‘हैप्पी'

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