भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।

सबसे बढ़कर

आलपीन के सिर होता पर
बाल न होता उसके एक ।

कुर्सी के दो बाँहें हैं पर
गेंद नहीं सकती है फेंक ।

कंधी के हैं दाँत मगर वह
चबा नहीं सकती खाना ।

गला सुराही का है पतला
किंतु न गा सकती गाना ।

होता है मुँह बड़ा घड़े का
पर वह बोल नहीं सकता ।

चार पैर पलंग के होते
पर वह डोल नहीं सकता ।

जूते के है जीभ मगर वह
स्वाद नहीं चख सकता है ।

आँखें होते हुए नारियल
देख नहीं कुछ सकता है ।

है मनुष्य के पास सभी कुछ
ले सकता है सबसे काम
इसीलिए दुनिया में सबसे
बढ़कर है उसका ही नाम।

- रमापति शुक्ल
[ बाल भारती 2002]

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।