विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।
 
कलियुग का एकलव्य (कथा-कहानी)     
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

'नमस्ते, मास्टरजी!' गली से निकलती उस लड़की को देख एक मनचले ने फबती कसी। लड़की बेचारी आँखे नीचे किए तेज़ क़दमों से वहाँ से निकल गई।

वह लड़की स्थानीय विद्यालय के एक अध्यापक की बेटी थी। 'मास्टजी, नमस्ते' का संबोधन करने वाला यह 'कलियुग का एकलव्य' भी उसी विद्यालय का छात्र था।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

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