विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।
 
अर्जुन या एकलव्य  (कथा-कहानी)     
Author:रोहित कुमार हैप्पी

'अर्जुन और एकलव्य' की कहानी सुनाकर मास्टर जी ने बच्चों से पूछा, "तुम अर्जुन बनोगे या एकलव्य?"

सारी कक्षा लगभग एक स्वर में बोली,"अर्जुन!"

मास्टर जी बच्चों की समझ पर प्रसन्न थे। तभी कोने में बैठे उस एक बच्चे पर उनकी नज़र पड़ी जो उत्तर देने की जगह मौन रहा था।

"रवि, तुम अर्जुन बनोगे या एकलव्य?"

"एकलव्य!"

उसका उत्तर सुनकर कक्षा के सभी बच्चे 'हीं -हीं ' करके दांत दिखा रहे थे।

"बेटा! एकलव्य क्यों, अर्जुन क्यों नहीं?"

"मास्टरजी, अर्जुन सब सुविधाएं पाकर भी भूलें कर देता था लेकिन एकलव्य सुविधाहीन होते हुए भी कभी भूल न करता था। उसका निशाना कभी नहीं चूका! गुणवान कौन अधिक हुआ?"

मास्टरजी के आगे एक नया 'एकलव्य' खड़ा था। अब मास्टर जी क्या करने वाले थे?

-रोहित कुमार 'हैप्पी'

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