विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।
 

बूंदों की चौपाल 

 (बाल-साहित्य ) 
 
रचनाकार:

 प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌ | Prabhudyal Shrivastava

हरे- हरे पत्तों पर बैठे,
हैं मोती के लाल।
बूंदों की चौपाल सजी है,
बूंदों की चौपाल।  

बादल की छन्नी में छनकर,
आई बूंदें मचल मटक कर।
पेड़ों से कर रहीं जुगाली,
बतयाती बैठी डालों पर।
नवल धवल फूलों पर बैठे,
जैसे हीरालाल।
बूंदों की चौपाल॥ 

सर -सर हिले हवा में पत्ते
जाते दिल्ली से कलकत्ते।
बिखर -बिखर कर गिर -गिर जाते,
बूंदों के नन्हें से बच्चे।
रिमझिम बूंदों से गीली हुई,
आंगन रखी पुआल।
बूंदों की चौपाल॥

पीपल पात थरर थर कांपा।
कठिन लग रहा आज बुढ़ापा।
बूंदें, हवा मारती टिहुनी,
फिर भी नहीं खो रहा आपा। 
उसे पता है आगे उसका ,
होना है क्या हाल।
बूंदों की चौपाल॥

-प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌
 ई-मेल: pdayal_shrivastava@yahoo.com

 

Back
 
Post Comment
 
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश