अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
तीन चींटियाँ  (कथा-कहानी)    Print  
Author:खलील जिब्रान
 

एक व्यक्ति धूप में गहरी नींद में सो रहा था। तीन चीटियाँ उसकी नाक पर आकर इकट्ठी हुईं। तीनों ने अपनी प्रथा अनुसार एक दूसरे का अभिवादन किया और फिर वार्तालाप करने लगीं।

पहली चीटीं ने कहा, "मैंने इन पहाड़ों और घाटियों से अधिक बंजर जगह और कोई नहीं देखी। मैं यहाँ सारा दिन अन्न ढ़ूँढ़ती रही, किन्तु मुझे एक दाना तक नहीं मिला।"

दूसरी चीटीं ने कहा, "मुझे भी कुछ नहीं मिला, यद्यपि मैंने यहाँ का चप्पा-चप्पा छान मारा। मुझे लगता है कि यही वह कोमल और अस्थिर जगह है, जिसके बारे में हमारे लोग कहते हैं कि यहाँ कुछ पैदा नहीं होता।"

तब तीसरी चीटीं ने अपना सिर उठाया और कहा, "मेरी सहेलियो! इस समय हम सबसे बड़ी चींटी की नाक पर बैठे हैं, जिसका शरीर इतना बड़ा है कि हम उसे पूरा देख तक नहीं सकते। इसकी छाया इतनी विस्तृत है कि हम उसका अनुमान नहीं लगा सकते। इसकी आवाज़ इतनी ऊँची है कि हमारे कान इसे सुन नहीं सकते, और वह सर्वव्यापी है।"

जब तीसरी चीटीं ने यह बात कही तो दूसरी चीटियाँ एक-दूसरे को देख  हँसने लगीं।

उसी समय वह व्यक्ति नींद में हिला। चींटियाँ लड़खड़ाई और गिरने के डर से उन्होंने अपने नन्हें पंजे उसकी नाक के मांस में गढ़ा दिए जिससे सोते हुए उस आदमी ने नींद में ही अपने हाथ से अपनी नाक खुजलायी और तीनों चींटियाँ पिसकर रह गईं।

- खलील जिब्रान

['The Three Ants' from 'Madam' by Khalil Jibran]

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश