अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
आत्म-निर्भरता  (कथा-कहानी)    Print  
Author:भारत-दर्शन संकलन | Collections
 

एक बहुत भोला-भाला खरगोश था। उसके बहुत से जानवर मित्र थे।  उसे आशा थी कि वक्त पड़ने पर मेरे काम आएँगे।

एक दिन शिकारी कुत्ते उसके पीछे पड़ गए। वह दौड़ता हुआ गाय के पास पहुँचा और कहा-आप हमारी मित्र है, कृपा कर अपने पैने सींगों से इन कुत्तों को मार दीजिए। गाय ने उपेक्षा से कहा-मेरा घर जाने का समय हो गया। बच्चे इन्तजार कर रहे होंगे, अब मैं ठहर नहीं सकती।

तब वह घोड़े के पास पहुँचा और कहा-मित्र घोड़े! मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर इन कुत्तों से बचा लो। घोड़े ने कहा-मैं बैठना भूल गया हूँ, तुम मेरी ऊँची पीठ चढ़ कैसे पाओगे?

अब वह गधे के पास पहुँचा और कहा-भाई, मैं मुसीबत में हूँ, तुम दुलत्ती झाड़ने में प्रसिद्ध हो, इन कुत्तों को लाते मारकर भगा दो। गधे ने कहा घर पहुँचने में देरी हो जाने से मेरा मालिक मुझे मारेगा। अब तो घर जा रहा हूँ। यह काम किसी फुरसत के वक्त करा लेना।

फिर वह बकरी के पास पहुँचा और उससे भी वही प्रार्थना की। बकरी ने कहा जल्दी भाग यहाँ से, मैं भी मुसीबत में फँस जाऊँगी। तब खरगोश को समझ आई कि दूसरों का आसरा तकने से नहीं, अपने बल-बूते से ही अपनी मुसीबत पार होती है, तब वह पूरी तेजी से दौड़ा और एक घनी झाड़ी में छिपकर उसने अपने प्राण बचा लिये।

[भारत-दर्शन संकलन]

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