हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। - र. रा. दिवाकर।
विजयादशमी (काव्य)    Print  
Author:सुभद्रा कुमारी
 

विजये ! तूने तो देखा है,
वह विजयी श्री राम सखी !
धर्म-भीरु सात्विक निश्छ्ल मन
वह करुणा का धाम सखी !!

बनवासी असहाय और फिर
हुआ विधाता वाम सखी !
हरी गई सहचरी जानकी
वह व्याकुल घनश्याम सखी !।

कैसे जीत सका रावण को
रावण था सम्राट सखी !
रक्षक राक्षस सैन्य सबल था
प्रहरी सिंधु विराट सखी !!

राम-समान हमारा भी तो
रहा नहीं अब राज सखी !
राजदुलारों के तन पर हैं
सजे फकीरी साज सखी !!

हो असहाय भटकते फिरते
बनवासी-से आज सखी !
सीता-लक्ष्मी हरी किसी ने
गयी हमारी लाज सखी !!

रामचन्द्र की विजय-कथा का
भेद बता आदर्श सखी !
पराधीनता से छूटे यह
प्यारा भारतवर्ष सखी !!

सबल पुरुष यदि भीरु बनें तो
हमको दे वरदान सखी।
अबलाएँ उठ पड़ें, देश में--
करें युद्ध घमसान सखी !!

पापों के गढ़ टूट पड़ें औ
रहना तुम तैयार सखी !
विजये! हम-तुम मिल कर लेंगी
अपनी माँ का प्यार सखी !!

- सुभद्राकुमारी चौहान

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश