हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। - र. रा. दिवाकर।
तुलसी बाबा (काव्य)    Print  
Author:त्रिलोचन
 

तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी
       मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो ।
कह सकते थे तुम सब कड़वी, मीठी, तीखी ।

प्रखर काल की धारा पर तुम जमे हुए हो ।
और वृक्ष गिर गए, मगर तुम थमे हुए हो ।
कभी राम से अपना कुछ भी नहीं दुराया,
देखा, तुम उन के चरणों पर नमे हुए हो ।
विश्व बदर था हाथ तुम्हारे उक्त फुराया,
तेज तुम्हारा था कि अमंगल वृक्ष झुराया,
मंगल का तरु उगा; देख कर उसकी छाया,
विघ्न विपद् के घन सरके, मुँह कहीं चुराया ।
आठों पहर राम के रहे, राम गुन गाया ।

यज्ञ रहा, तप रहा तुम्हारा जीवन भू पर ।
भक्त हुए, उठ गए राम से भी, यों ऊपर ।

                            - त्रिलोचन [दिगन्त]

 

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश