यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
जननी जन्मभूमि (काव्य)    Print  
Author:रामप्रसाद बिस्मिल
 

हाय! जननी जन्मभूमि छोड़कर जाते हैं हम, 
देखना है फिर यहाँ कब लौट कर आते हैं हम। 
स्वर्ग के सुख से भी ज्यादा सुख मिला हम को यहाँ, 
इसलिए तजते इसे, हर बार शर्माते हैं हम।
ऐ नदी-नालो! दरख्तो! पक्षियो! मेरा कसूर, 
माफ करना, जोड़ कर तुम से फर्माते है हम। 
माँ! तुझे इस जन्म में कुछ सुख न दे पाए कभी, 
फिर जनम लेंगे यहीं, यह कौल कर जाते हैं हम।।

-राम प्रसाद बिस्मिल

[बिस्मिल ने उपरोक्त पंक्तियाँ उन्होंने 'जननी-जन्मभूमि' के प्रेम मे सराबोर होकर फाँसी की कोठरी में लिखी थी।]

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश