अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
भूखे-प्यासे  (काव्य)    Print  
Author:देवेन्द्र कुमार मिश्रा
 

वे भूखे प्यासे, पपड़ाये होंठ
सूखे गले, पिचके पेट, पैरों में छाले लिए
पसीने से तरबतर, सिरपर बोझा उठाये
सैकड़ो मील पैदल चलते
पत्थर के नहीं बने
पथरा गये चलते-चलते।

टूटी आस, अटकती सांस लिए
घर को जा रहे हैं,
जहां भूख पहले से प्रतीक्षा में है उनकी।
वे मजदूर हैं, मेहनतकश हैं
चेारी कर नहीं सकते
बस मर सकते हैं।

और मरने का जतन आप
कर रहे हैं उनका।
कर्मभूमि से जन्मभूमि की यात्रा
छूटी रोटी से भूख की मात्रा
बढ़ती जा रही है।
कुछ नहीं कर सकते तो
श्मशान का आकार बढ़ाओ
बाद में मत कहना कि शवों को जलाने की
पर्याप्त व्यवस्था में कुछ समय लगेगा।

- देवेन्द्र कुमार मिश्रा
  पाटनी कालोनी, भरत नगर,
  चन्दनगाँव जि.छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001
  मो:9425405022
  ई-मेल: devendra.5022mishra@gmail.com

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