जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।
उपदेश : कबीर के दोहे  (काव्य)    Print  
Author:कबीरदास | Kabirdas
 

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख ऊपजै, और ठगे दुख होय॥

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥

जो तोकौ काँटा बुवै, ताहि बोवे फूल।
तोहि फूल को फूल है, वा को है तिरसूल॥

दुर्बल को न सताइये, जा की मोटी हाय।
बिना जीव की- स्वास से, लोह भसम ह्वै जाय॥

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन कौं सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

हस्ती चढ़िए ग्यान की, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भूंकन दे झख मारि॥

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक॥

जैसा अन-जल खाइये, तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय॥

करता था तो क्यों रहा, अब करि क्यों पछिताय।
बोवै पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते खाय॥

दान किये धन ना घटे, नदी ना घटै नीर।
अपनी आँखों देखिये, यों कहि गये कबीर॥

रूखा-सूखा खाइ कै, ठंडा पानी पीव।
देख विरानी चोपड़ी, मत ललचावै जीव॥

- कबीर

 

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें