अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
प्रश्न | लघुकथा (कथा-कहानी)    Print  
Author:रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
 

बाप श्मशान से घर लौटा।

सात वर्ष का लड़का--उघाड़े बदन, गले में सोने का ताबीज़--अकेला गली वाले जंगल के पास खड़ा था।

क्या सोच रहा था, उसे खुद नहीं मालूम।

सवेरे की घाम सामने वाले नीम की फुनगी पर दिखाई देने लगी; अमिया बेचनेवाला, गली में आवाज़ देता हुआ निकल गया।

बाप ने आकर लल्ला को गोद में लिया; लल्ला ने पूछा--"माँ कहाँ है?"

बाप ने ऊपर की ओर सिर उठाकर कहा-"भगवान के पास।"

रात को, शोक-सन्तप्त बाप, सोते-सोते क्षण-क्षण में रोने लगा- आँखों में आने वाले आँसू छाती की छाती में ही घुमड़-घुमड़कर रह गए।

दरवाज़े पर टिमटिमाती हुईं लालटेन है, दीवारपर छिपकली का जोड़ा।

सामने खुली छत है। मालूम नहीं, कब से लल्ला वहाँ आकर खड़ा है।

चारों तरफ़ बत्ती-बुझे मकान मानो दैत्यपुरीके पहरेदार-से खड़े-खड़े सो रहे हैं।

लल्ला उघड़े-बदन खड़ा-खड़ा ऊपर आकाश की ओर एकटक देख रहा है।

उसका भटका हुआ मन किसी से पूछ रहा है --"भगवान के पास जाने का रास्ता किधर हैं?"

आकाश उसका कोई जवाब नहीं देता; सिर्फ़ तारों में गूंगे अन्धकार के आँसू चमक रहे हैं।

रबीन्द्रनाथ टगौर
अनु०-धन्यकुमार, विशाल भारत [जनवरी 1942]

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