जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।
रामनरेश त्रिपाठी के नीति के दोहे  (काव्य)    Print  
Author:रामनरेश त्रिपाठी
 

विद्या, साहस, धैर्य, बल, पटुता और चरित्र।
बुद्धिमान के ये छवौ, है स्वाभाविक मित्र ।।

नारिकेल सम हैं सुजन, अंतर, दयानिधान ।
बाहर मृदु भीतर कठिन, शठ हैं बेर समान ॥

आकृति, लोधन, वचन, मुख, इंगित, चेष्टा, चाल ।
बतला देते हैं यही, भीतर की सब हाल ।।

शस्त्र वस्त्र भोजन भवन, नारी सुखद नवीन ।
किन्तु अन्न, सेवक, सचिव, उत्तम हैं प्राचीन ।।

- रामनरेश त्रिपाठी
  [ पद्यपीयूष ]

 

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें