हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।
पीहर (काव्य)    Print  
Author:स्वरांगी साने
 

कविता में जाना
मेरे लिए पीहर जाने जैसा है।

मुक़ाम पर पहुँचते ही
लिवाने आ जाते हैं शब्द

दिमाग का सारा ज़रूरी, गैर ज़रूरी सामान
रख देते हैं कल्पना की गाड़ी में।
घूमती हूँ मन की सँकरी-चौड़ी सड़कों पर
दरवाज़े पर ही खड़ी होती है
हँसती-मुस्कुराती कविता
वह माँ होती है मेरे लिए।

जब लौटती हूँ
तो सारे गैर ज़रूरी सामान का
संपादन कर छोड़ने आते हैं पिता की तरह विराम चिन्ह।

कविता के घर से
इस तरह लौट आती हूँ
जैसे लौटती हैं लड़कियाँ मायके से
बहुत कुछ लेकर।

- स्वरांगी साने

Back
 
 
Post Comment
 
  Captcha
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें