राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
ग़ज़लें
ग़ज़ल क्या है? यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्‍द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्‍पणी के माध्‍यम से पृथक से प्रश्‍न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्‍तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्‍छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्‍त में निम्‍नानुसार हैं: ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्‍ला, मक्‍ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन में ही हैं। यहॉं यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि किसी ग़ज़ल में सभी शेर एक ही विषय की निरंतरता रखते हों तो एक विशेष प्रकार की ग़ज़ल बनती है जिसे मुसल्‍सल ग़ज़ल कहते हैं हालॉंकि प्रचलन गैर-मुसल्‍सल ग़ज़ल का ही अधिक है जिसमें हर शेर स्‍वतंत्र विषय पर होता है। ग़ज़ल का एक वर्गीकरण और होता है मुरद्दफ़ या गैर मुरद्दफ़। जिस ग़ज़ल में रदीफ़ हो उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं अन्‍यथा गैर मुरद्दफ़।

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ऐसे कुछ और सवालों को | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह

ऐसे कुछ और सवालों को उछाला जाये
किस तरह शूल को शूलों से निकाला जाये

फिर चिराग़ों को सलीक़े से जलाना होगा
तम है जिस छोर, उसी ओर उजाला जाये

ये ज़रूरी है कि ख़यालों पे जमी काई हटे
फिर से तहज़ीब के दरिया को खँगाला जाये

 फावड़े और कुदालें भी तो ढल सकती हैं
अब न इस्पात से ख़ंज़र कोई ढाला जाये

-राजगोपाल सिंह
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धरती मैया | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह

धरती मैया जैसी माँ
सच पुरवैया जैसी माँ
 
पापा चरखी की डोरी
इक कनकैया जैसी माँ

तूफ़ानों में लगती है
सबको नैया जैसी माँ

बाज़ सरीखे सब नाते
इक गौरैया जैसी माँ

-राजगोपाल सिंह


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चुप क्यों न रहूँ | ग़ज़ल - त्रिलोचन

चुप क्यों न रहूँ हाल सुनाऊँ कहाँ कहाँ
जा जा के चोट अपनी दिखाऊँ कहाँ कहाँ
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इश्क और वो इश्क की जांबाज़ियाँ | ग़ज़ल - उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk

इश्क और वो इश्क की जांबाज़ियाँ
हुस्न और ये हुस्न की दम साज़ियाँ
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ज़िन्दगी को औरों की - ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र

ज़िन्दगी को औरों की ख़ातिर बना दिया
घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना दिया
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यूँ कहने को बहकता जा रहा हूँ - नरेश शांडिल्य

यूँ कहने को बहकता जा रहा हूँ
मगर सच में सँभलता जा रहा हूँ
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