वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।
मेरी औक़ात का... (काव्य)    Print this  
Author:ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek

मेरी औक़ात का ऐ दोस्त शगूफ़ा न बना
कृष्ण बनता है तो बन, मुझको सुदामा न बना

ये हवाएँ कभी पत्थर भी उठा लेती हैं
अपना शीशे का मकाँ इतना भी अच्छा न बना

देख ! टूटे हुए तारे से मुहब्बत मत कर
और गिरती हुई दीवार को अपना न बना

कोई पक्षी मेरे आँगन में न उतरे दिनभर
मेरे भगवान ! मुझे इतना अकेला न बना

अपने ज़ख़्मों की नुमाइश तुझे करनी है तो कर
इल्तिजा है कि मेरे दुख का तमाशा न बना

- ज्ञानप्रकाश विवेक

 

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