हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।
इतिहास के पन्नों से
ऐतिहासिक तथ्यों, घटनाओं और साक्ष्यों पर आधारित आलेख, निबंध, काव्य व ऐतिहासिक कथा-कहानियों का संकलन।

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मक़सद | कविता - राजगोपाल सिंह

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की 'देश-भक्ति' को अपराध की संज्ञा देकर फाँसी पर लटका दिया गया। कहा जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह तय की गई थी लेकिन किसी बड़े जनाक्रोश की आशंका से डरी हुई अँग्रेज़ सरकार ने 23 मार्च की रात्रि को ही इन क्रांति-वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी। रात के अँधेरे में ही सतलुज के किनारे इनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया।
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हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गई यह देशभक्त तिकड़ी | 23 मार्च 1931  - भारत-दर्शन संकलन

अमर शहीद भगतसिंह का जन्म- 27 सितंबर, 1907 को बंगा, लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) हुआ था व 23 मार्च, 1931 को इन्हें दो अन्य साथियों सुखदेव व राजगुरू के साथ फांसी दे दी गई। भगतसिंह का नाम भारत के सवतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय है। भगतसिंह देश के लिये जीये और देश ही के लिए शहीद भी हो गए।
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भगतसिंह की पसंदीदा शायरी  - भारत-दर्शन संकलन

उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फा क्या है,
हमे यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
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आह्वान  - अशफ़ाक उल्ला खाँ

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएँगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।
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सुनाएँ ग़म की किसे कहानी - अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ

सुनाएँ ग़म की किसे कहानी हमें तो अपने सता रहे हैं।
हमेशा सुबहो-शाम दिल पर सितम के खंजर चला रहे हैं।।
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भाई कुलतार सिंह के नाम भगतसिंह का अंतिम पत्र  - इतिहास के पन्ने

अजीज कुलतार,
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23 मार्च 1931 को हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गई यह देशभक्त तिकड़ी  - भारत-दर्शन संकलन

अमर शहीद भगतसिंह का जन्म- 27 सितंबर, 1907 को बंगा, लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) हुआ था व 23 मार्च, 1931 को इन्हें दो अन्य साथियों सुखदेव व राजगुरू के साथ फांसी दे दी गई। भगतसिंह का नाम भारत के सवतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय है। भगतसिंह देश के लिये जीये और देश ही के लिए शहीद भी हो गए।
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भारत-दर्शन रोजाना

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