एक लाभ होता है लगाने का। जैसे तेल लगाना, मक्खन लगाना, चूना लगाना आदि। इसका पहला और प्रत्यक्ष लाभ तो यह है कि इस लगाने में कोई खर्च नहीं है। बस सिर्फ लगा भर देने से काम चल जाता है। पानी लगाने के लिए वास्तव में आपको न तेल चाहिए, न मक्खन और न चुना। यदि सचमुच लगाने के लिए इन वस्तुओं का इस्तेमाल करना हो तो लगाने वालों की संख्या आधी भी नहीं रह जाती। चूंकि मुफ्त में यह सब लग जाता है, इसलिए लोग मजे से दूसरों को लगा देते हैं। इसलिए यह सब लगाने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, जो तनिक सिद्धांतवादी हैं, वे भी कभी-न-कभी, किसी-न-किसी को, कुछ-न-कुछ लगाने के लिए मजबूर हो ही जाते हैं। दरअसल, बिना कुछ लगाए आज के जमाने में काम ही नहीं चलता है। जब तक लगाने में हिचक होती है, दिक्कत सिर्फ तभी तक है। एक बार संकोच से बाहर आकर किसी को अपनी जरूरत के हिसाब से, इन वस्तुओं में से कुछ लगा दें तो फिर लगाते जाने का सिलसिला अपने-आप चालू हो जाता है।
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