यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
हास्य काव्य
भारतीय काव्य में रसों की संख्या नौ ही मानी गई है जिनमें से हास्य रस (Hasya Ras) प्रमुख रस है जैसे जिह्वा के आस्वाद के छह रस प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार हृदय के आस्वाद के नौ रस प्रसिद्ध हैं - श्रृंगार रस (रति भाव), हास्य रस (हास), करुण रस (शोक), रौद्र रस (क्रोध), वीर रस (उत्साह), भयानक रस (भय), वीभत्स रस (घृणा, जुगुप्सा), अद्भुत रस (आश्चर्य), शांत रस (निर्वेद)।

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क्या कीजे - प्रदीप चौबे

गरीबों का बहुत कम हो गया है वेट क्या कीजे 
अमीरों का निकलता आ रहा है पेट क्या कीजे
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पूत-कपूत | हास्य-कविता - अल्हड़ बीकानेरी 

डैडी, मोरे अवगुन चित न धरो, 
मैं लाडलो कपूत तिहारो, मो पै गरब करो।
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