यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
व्यंग्य
हिंदी व्यंग्य. Hindi Satire.

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हैलो सूरज!  - डॉ सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

हो न हो चाचा मामा से बड़े गुस्सैले होते हैं, नहीं तो चंदा को मामा और सूरज को चाचा क्यों कहते। कभी-कभी तो उसका गुस्सा देख दादा भी कह उठते हैं। ब्रह्मांड में कई आकाशगंगा है। उनमें से एक आकाशगंगा का एक छोटा सा भाग है हमारा सौरमंडल और सौरमंडल के प्रधान हैं हमारे सूरज चाचा। सूरज चाचा एक ही स्थान पर टिके हैं। वे किसी के आगे-पीछे चिरौरी करने नहीं घूमते। बल्कि दुनिया के लोग उन्हें गर्मी की सेटिंग करने की सलाह दे डालते हैं। हाँ यह अलग बात है कि वे किसी की नहीं सुनते। उनमें 72% पेड़ों को काटने का हाइड्रोजन वाला गुस्सा, 26% बचे-खुचे पेड़ों को पानी न डालने वाला हिलियम गुस्सा, 2% पर्यावरण के नाम पर नौटंकी करने और मुँह काला करवाने वाला कार्बनी गुस्सा, और कभी-कभी किसी के पुण्य पर ऑक्सीजन बनकर प्रेम लुटाने का काम करते हैं। सूरज चाचा का रंग अभी भी सफ़ेद है, इसलिए कि वे किसी खादी की दुकान से कपड़ा नहीं लेते। 
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पत्रकार, आज़ादी और हमला - प्रो. राजेश कुमार

मास्टर अँगूठाटेक परेशानी की हालत में इधर से उधर फिर रहे थे, जैसे कोई बहुत ग़लत घटना हो गई हो, और वे उसे सुधारने के लिए भी कुछ न कर पा रहे हों।

“क्यों परेशान घूम रहे हो? ऐसा क्या हो गया?" लतीपतीराम ने पूछा।
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पूंछ - लतीफ घोंघी

पूंछ और पोंगली की चर्चा आदिकाल से होती रही है। दोनों के बीच भले ही मधुर सम्बन्धों का उल्लेख न मिलता हो, लेकिन व्यवस्था में पूंछ सीधी करने का शाश्वत प्रश्न हमेशा खड़ा होता है और पोंगली जैसी पावरफुल वस्तु का उपयोग वीरगाथा काल से आपातकाल तक होता रहा है। यही कारण है कि आदिकाल से इस युग तक पोंगली का अस्तित्व बना हुआ है। कहीं-कहीं ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि पूंछ सीधी करने की कोशिश में कोई-कोई पोंगली टेढ़ी भी हो जाती है, लेकिन ऐसे उल्लेख बहुत कम मिले हैं। हां, यह उल्लेख जरूर मिलता है कि पूंछ जब तक पोंगली में रहती है, तभी तक सीधी रहती है और पोंगली से बाहर आते ही वह फिर टेढ़ी हो जाती है। यदि यह आदत भी पूंछ में न रहे तो उसे पूंछ कहना ही बेकार है। पूंछ दी ही इसलिए जाती है कि वह टेढ़ी रहे।
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