यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
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कैसा विकास - प्रभाकर माचवे

यह कैसा विकास
चारों और उगी है केवल
गाजर घास
गाजर घास।
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कविता और फसल - ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki

ठंडे कमरों में बैठकर
पसीने पर लिखना कविता
ठीक वैसा ही है
जैसे राजधानी में उगाना फसल
कोरे कागजों पर
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तीन कविताएं  - डॉ सुशील शर्मा

क्या होती है स्त्रियाँ?
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आदमी और दीवार - मंगत बादल

एक आदमी
बगावत का पोस्टर लिये
दीवार के पास खड़ा है,
यह आदमी
सही मायने में
अपने कद से बड़ा है।
उसकी आँखों में
एक जंगल उग आया है,
जिसके तमाम रास्ते
उसने याद कर लिये हैं ।
उसके कदमो में अब
भटकाव की जगह
विश्वास की झलक है
अब एक ऊंचाई तक
दीवार उसके साथ है
जहाँ उसका आक्रोश
और तनी हुई मुट्ठी
हर कोई देख सकता है।
क्रांति की जलती हुई मशाल
थामने के लिये
उसके हज़ार-हज़ार हाथ हैं
ये हाथ ही
वर्तमान के पृष्ठ पर
भविष्य का इतिहास बनाते हैं।
और उसकी प्रबल धारा से
दुर्द्धर्ष संघर्ष करते हुए
उत्सव मनाते हैं।
क्योकि दीवार जब
आदमी के संघर्ष से जुड़ जाती है
तब तमाम पुरातन मान्यतायें
नये युग की ओर मुड़ जाती है।
...

यह बता : एक प्रश्न - महेश भागचन्दका

तेरे पास क्या है
इससे जहाँ को सरोकार नहीं
तूने जहाँ के लिए किया क्या-- 'यह बता '
तू जी रहा है और जिए जाएगा, मगर
जाने से पहले क्या कर जाएगा-- 'यह बता '
जीवन का श्वासों से
श्वासों का क्रम से है इक नाता
इसके टूटने को बचा पाएगा क्या-- 'यह बता '
इतराना तेरी नहीं समय की ताक़त है
समय बदला तो क्या तू इतरा पाएगा-- 'यह बता
हम अपनी हस्ती को साथ लिये घूमते हैं
मस्ती में चूर हम जहाँ को भूलते हैं
ठुकराना हमारी आदत सी हो गई है
पर जहाँ की इक ठोकर को
हममें से कोई भी क्या सँभाल पाएग-- 'यह बता '
...

कविता का अर्थ - मदन डागा

मेरी भाषा का व्याकरण
पाणिनि नही
पददलित ही जानते हैं
क्योंकि वे ही मेरे दर्द को--
पहचानते हैं :
मेरी कविता का कमल
बगीचे के जलाशयों में नही;
झुग्गी-झोंपड़ियों के कीचड़ में खिलेगा
मेरी कविता का अर्थ
उत्तर-पुस्तिकाओं में नहीं
फुटपाथों पर मिलेगा !
...

बनारस - बेढब बनारसी

बनारसवाद साहित्य का
वह वाद है जो सबसे अलग हैं,
सबसे मिला हुआ है।
कुछ लोगों का कहना है,
बनारस में साहित्यकार नहीं हैं,
उनका कथन ठीक है।
यहाँ साहित्यकार नहीं
संत होते हैं,
और जो संत नहीं होते
वह मस्त होते हैं--
वाद से परे,
विवाद से दूर
जाह्नवी को माता
विश्वनाथ को बाबा समझकर
जीवन यापन करते हैं।
वह ताव पर लिखते हैं
बनाव से भागते हैं।
इसी परंपरा का
लघु संस्करण
मैं भी हूं।
...

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