एक शाम जिंदगी तमाम हो गई
लेने को पहुंचे जो फरिश्ते
टूट गये सब नाते-रिश्ते,
फिर रोके कुछ रूक नहीं पाया,
हाथ किसी के कुछ नहीं आया
सब देखते रहे, यह बात खुले आम हो गई
एक शाम जिंदगी तमाम हो गई
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गीतों में प्राय: श्रृंगार-रस, वीर-रस व करुण-रस की प्रधानता देखने को मिलती है। इन्हीं रसों को आधारमूल रखते हुए अधिकतर गीतों ने अपनी भाव-भूमि का चयन किया है। गीत अभिव्यक्ति के लिए विशेष मायने रखते हैं जिसे समझने के लिए स्वर्गीय पं नरेन्द्र शर्मा के शब्द उचित होंगे, "गद्य जब असमर्थ हो जाता है तो कविता जन्म लेती है। कविता जब असमर्थ हो जाती है तो गीत जन्म लेता है।" आइए, विभिन्न रसों में पिरोए हुए गीतों का मिलके आनंद लें।
एक शाम जिंदगी तमाम हो गई
लेने को पहुंचे जो फरिश्ते
टूट गये सब नाते-रिश्ते,
फिर रोके कुछ रूक नहीं पाया,
हाथ किसी के कुछ नहीं आया
सब देखते रहे, यह बात खुले आम हो गई
एक शाम जिंदगी तमाम हो गई
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जाने कब की देखा-देखी, धीरे-धीरे प्यार बन गई
लहर-लहर में चाँद हँसा तो लहर-लहर गलहार बन गई
स्वप्न संजोती सी वे आँखें, कुछ बोलीं, कुछ बोल न पायीं
मन-मधुकर की कोमल पाखें, कुछ खोली, कुछ खोल न पायीं
एक दिवस मुसकान-दूत जब प्रणय पत्रिका लेकर आया
ज्ञात नहीं, तब उस क्षण मैंने, क्या-क्या खोया, क्या-क्या पाया
क्षण भर की मुसकान तुम्हारी, जीवन का आधार बन गई।
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चलो कहीं पर घूमा जाए,
थोड़ा मन हल्का हो जाए।
सबके, अपने-अपने ग़म हैं,
किस ग़म को कम आँका जाए।
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