शरद की उस गहन अंधेरी रात में एक वृद्ध साहूकार महाजन अपने अध्ययनकक्ष में चहलकदमी कर रहा था। उसे याद आ रही थी 15 वर्ष पहले की शरद पूर्णिमा की वह रात जब उसने एक दावत दी थी। उस पार्टी में कई विद्वान व्यक्ति आए हुए थे और बड़ी रोचक बातचीत चल रही थी। अन्य विषयों के बीच बात मृत्यु-दंड पर आ गई। मेहमानों में कई विद्वान व्यक्ति तथा पत्रकार भी थे जो मृत्युदंड के विरोध में थे और मानते थे कि यह प्रथा समाप्त हो जानी चाहिये क्योंकि वह सभ्य समाज के लिये अशोभनीय तथा अनैतिक है। उनमें कुछ लोगों का कहना था कि मृत्युदंड के स्थान पर आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त होनी चाहिये।
...