बदन पे जिसके शराफत का पैरहन देखा
वो आदमी भी यहाँ हमने बदचलन देखा
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सूर्य की अब किसी को ज़रूरत नहीं, जुगनुओं को अँधेरे में पाला गया
फ़्यूज़ बल्बों के अद्भुत समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया
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रखकर अपनी आंख में कुछ अर्जियां, तुम देखना
बस मिलेंगी कागजी हमदर्दियां, तुम देखना
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एक दरी, कंबल, मफलर, मोज़े, दस्ताने रख देना
कुछ ग़ज़लों के कैसेट, कुछ सहगल के गाने रख देना
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ख़्वाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली
वक़्त ने हमसे हमारी हर कहानी छीन ली।
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